हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २३७
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ।।३।।
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
श्री भगवान म्हणाले
कोठूनि भलत्या वेळीं सुचलें पाप हैं तुज ।
असें रुचे न थोरांस ह्याने दुष्किर्ति दुर्गति ॥२॥
निर्वीय तू नको होऊ न शोभें हें मुळी तुज।
भिकार दुबळी वृत्ती सोडूनि उठ तू कसा॥३॥
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अर्जुन की आंदोलित मनस्थिति का पूर्ण आकलन अबतक प्रभु को हो गया है।
अर्जुन के निराशापूर्ण वक्तव्य पर उन्होंने अब अर्जुन से कहा, "ऐसा मोह तुम्हे इस असमय में क्यों हो रहा है पार्थ? ऐसा आचरण थोर पुरुष नहीं करते है। (यह सद्विचार / सत्कर्म नहीं हैं , इसलिए) इससे ना तो स्वर्ग की प्राप्ती होगी और ना ही किर्ती प्राप्त करोगे।"
प्रभु आगे कहते है, "इस प्रकार नपुंसक समान व्यवहार मत करो, तुम्हें यह शोभा नहीं देता। अपने मन इस तुच्छतापूर्ण दुर्बलता को त्याग दो और परन्तक, तुम युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।"
दूसरे अध्याय के प्रारंभ में यह दो श्लोक आतें है। पहले अध्याय में अर्जुन बोल रहे थे और बहुत कुछ बोल गए है वह। उनके इतने दीर्घ कथन (रुदनसमान वक्तव्य) पर प्रभु ने केवल दो श्लोकों में उन्हे उनके आभासमय मनोलोक (imaginary/illusion like world) से खींचकर वास्तव विश्व में लाने का पहला प्रयास किया है, वैसे ही जैसे प्रगाढ नींद में सोए हुए व्यक्ति पर पानी के छींटे डालकर उसे स्वप्नसृष्टी से वर्तमान में लाया जाता है !
महाभारत में श्रीकृष्ण के चातुर्य के अनेक उदाहरण हैं। यहाँ उनकी चतुरता और प्रसंगावधान का एक और पहलु दृश्यमान हो रहा है।
वह एक कुशल समुपदेशक (Councellor) की भूमिका में आ गएं है। अर्जुन का मनस्थिति वह समझ गएं है इसलिए साधारणतया जो उपाय काम कर जाता है, प्रभु ने वहीं से उपचार आरंभ किया है।
इसे हमारे घर में छोटे बालक के उदाहरण से समझ सकतें है। बालक अपने खिलौने भूमि पर फेंक रहा है। उसे नहीं समझ की ऐसें नहीं करना चाहिए। उसे यदि सीधे कहा जाएं की 'खिलौने उठाकर अलमारी में / टोकरी में रख हो' तो वह नहीं मानेगा। इसलिए घर के बडे लोग उसकी समझ और क्षमताओं को ललकारकर कहते हैं कि 'आप तो बहुत छोटे हो, खिलौने उठाकर नहीं रख पाओगे। और फिर बाकी सब भी आपकी प्रशंसा नहीं करेंगे। पर क्या करें , आप तो कर ही नहीं सकते हो.."
बालक ही सही किंतु यह बात उसके स्वाभिमान को आहत करती है और अपनी क्षमता सिद्ध करने के लिए वह खिलौने उठाने लगता है।
पहले प्रयत्न के रूप में श्रीकृष्ण ने यही उपाय किया है। उन्होंने अर्जुन की क्षमता और स्वाभिमान को ललकारा है। प्रभु ने इसके लिए उपयोग किए हुए शब्द (विशेषण = adjectives) देखिए , क्लीब (नपुंसक / पुरुषार्थहीन), क्षुद्र और हृदय की दुर्बलता दिखानेवाले विचार आदि....
अर्जुन में कितने गुण है , महावीर है वह...
निश्चयी है...
प्रचंड संख्या की सेना से अकेले युद्ध कर भी वह विजयी होते है...
भय नामक भावना से तो उनका परिचय ही नहीं है... अर्जुन का व्यक्तित्व पुरुषार्थ से परिपूर्ण है !
इन सारे गुणों के कारण अर्जुन का व्यक्तिमत्व निष्कलंक है (beyond doubt) और उनकी किर्ती सर्वत्र फैली हुई है और ज्येष्ठ व्यक्ति, गुरुजन आदि के लिए अर्जुन के मन में सम्मान है और स्वयं का व्यवहार इन सबकी मान्यताओं के अनुरूप होने को वह अत्याधिक महत्व देते है।
ऐसे व्यक्ति के लिए यदि निर्भत्सनापूर्ण शब्द कहे जाएंगे तो क्या उसका मन आहत नहीं होगा ?
उसे क्रोध भी आ सकता है...
अर्जुन अपयश और दुष्किर्ती की कल्पना नहीं सह पाएंगे..
संभावना है कि ऐसे शब्द सुनकर उनकी हताशा, निराशा दूर हो जाए और वह आवेश में युद्ध के लिए रणक्षेत्र में तनकर खडे हो जाए...
प्रभु का यह पहला प्रयत्न है जहाँ वह अर्जुन की निर्भत्सना कर उनमें चेतना जगाने का प्रयत्न कर रहें है। इसलिए उन्होने एक और उपाय यहाँ किया है। वह अर्जुन को प्रेम से 'पार्थ' इस नाम से संबोधित कर रहें है और उन्हे 'परन्तप' (तपस्या कर इन्द्रियों को नियंत्रण में रखनेवाला) भी कह रहें है। एक और अर्जुन को चुभनेवाले विशेषणों का उपयोग कर, शब्दों के शूल हलके से चुभाकर उन्हे उनके वास्तव रूप में लाने का प्रयत्न है और दूसरी ओर उन्हे उनकी क्षमता का स्मरण दिलाने के लिए 'परन्तप' यह गौरवपूर्ण संबोधन भी है !
इसपर अर्जुन की प्रतिक्रिया क्या होती है यह देखना रोचक होगा !
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क्रमश :
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