हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २२९

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । 
स्त्रीषु दुष्टासु वाष्र्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥४१॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
अधर्म माजतों तेव्हा भ्रष्ट होती कुल - स्त्रिया।
स्त्रियां बिघडता कृष्णा घडतो वर्ण - संकर ॥४१॥
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युद्ध के कारण समाज में फैलनेवाले अधर्म के लिए अर्जुन चिंता प्रकट कर रहें है। उनका कहना है कि जब समाज में धर्म का महत्व कम होने लगता है तब स्त्रियों के पावित्र्य पर आँच आती है और उन्हे संकटों का सामना करना पडता है जिसमें उनके पतित (apostate) होने की संभावना होती है।
वह कह रहें है कि इस प्रकार स्त्रियों के अधःपतन के कारण वर्ण - संकर होता है। वर्ण संकर का अर्थ है एक ही वर्ण के स्त्री पुरुषों से उसी वर्ण की वंशवृद्धी ना होकर विभिन्न वर्णों में आपस में संबध आकर दिशाहीन समाज निर्माण हो सकता है।

इस विषय को समझना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि अर्जुन ने इसमें केवल इतिहास पर आधारित विधान (statement) नहीं किया है, उन्होने तो जैसे भारतवर्ष के भविष्य में झांककर आनेवाले अत्यंत कठिन कालखण्ड की भविष्यवाणी की है !

युद्ध के कारण समाज की व्यवस्था में छेद होने लगते है, दरारें निर्माण होती है और ऐसे समाज में धर्म - न्याय - तत्व -  पावित्र्य - कर्तव्य इन मूल्यों का अस्तित्व मिटने लगता है।
युद्ध के कारण विशेषतः पुरुषों की मृत्यु होती है। समाज में स्त्री पुरुषों की संख्या में भारी मात्रा में विषमता निर्माण होती है जिससे सामाजिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती है। विजयी पक्ष के पुरुष  पराभूत पक्ष की स्त्रियों से बलपूर्वक विवाह करते है अथवा उनपर अत्याचार भी करतें हैं । दोनो ही स्थिति में जन्म लेनेवाली प्रजा में अस्थिर मनोवृत्ति निर्माण होने की संभावना बढती है । इस प्रकार बलपूर्वक वर्णसंकर किया गया हो तो उनकी संतति के लिए परंपरा - कुल - सामाजिक स्थान आदि मनुष्यजीवन की नीव (plinth) माने गए घटक नहीं होते है। इस कारण ऐसी प्रजा आक्रमक मनोवृत्ती की और नृशंस (क्रूर = cruel) बनने का भय बढ़ता है । 

ऐसी प्रजा में सामाजिक सद् भाव बनाए रखने की और सौहार्दपूर्ण सहजीवन (live & let live) बिताने की इच्छा प्रायः नहीं पायी जाती है। 
ऐसी प्रजा में असुरक्षितता की भावना अधिक रूप में हो सकती है , वह अपने लिए भौतिक और सामाजिक स्तर पर सुरक्षित स्थान बनाना चाहते है जिससे समाज में उनका इतना वर्चस्व (dominance) बना रहें कि वह अन्य समाजघटकों पर हावी हो सकें (establishing safe abode in terms of number- leading to demographic changes,  capturing more geographical area & establish strong closed community to threaten other communities to ensure supremacy)। 

ऐसी असुरक्षित मनोवृत्तिवाली प्रजा में समाज के उन लोगों के प्रति शत्रुता की भावना प्रबल हो सकती है जो जन्म से एक सुव्यवस्थित समाज के सदस्य है। ऐसे में वह अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए विविध प्रकार से सामाजिक दबाव बनाकर रख सकते है जिसके लिए वह नैतिकता, न्याय, सामाजिक समरसता इत्यादी मूल्यों को भी परे रख सकते है (ignore or disrespect principles of morality, justice & communal harmony)। 
वह मूल समाज को दुर्बल करने के लिए उनकी संपत्ति हडपना, उनकी परंपराएँ, त्योहार, उत्सवों पर प्रतिबंध लगाना अथवा बाधा डालना इत्यादी उपाय अपना सकते है, उनके शैक्षणिक संस्थान, कला व संस्कृती के केंद्र, उनके श्रद्धास्थान नष्ट कर सकते है , उनकी पारंपारिक जीवनशैली का उपहास कर सकते है अथवा उन्हे अपनी ही पद्धती के वस्त्र, आहार इ. अपनाने के लिए दबाव डाल सकते है या विवश कर सकते है ।

विश्व के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण है, भारत के इतिहास में भी कम नहीं है।
दुष्टबुद्धी, आक्रमक, अन्यायी, लोभी, सत्ताकांक्षी लोग प्रत्येक समूह में होते है और उनके कारण समाज में अराजकता भी फैल सकती है। किंतु ऐसी मनोवृत्ति वाले कुछ पृथक लोगों का अस्तित्व और ऐसी वृत्ति के लोगों के बडे समूह का वर्चस्ववादी अस्तित्व इसमे अंतर अवश्य है (difference between existence of isolated individuals of such mentality & large dominant group of people with such mentality) !

इन परिणामों की संभाव्यता और विश्व के इतिहास में पाएं जानेवाले उदाहरणों से दृगोच्चर (visible) होनेवाली उनकी व्याप्ति और भयानकता इसपर विचार करने पर हम अर्जुन के विधान को समझ पाएंगे।
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क्रमश :
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