हिंदु धर्मसंस्कार🚩: भाग २२५

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥३६॥
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् । 
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३७।।  
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गीताई ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
ह्यां कौरवांस मारूनि कायसे आमुचे प्रिय।
अत्याचारी जरी झाले यांस मारूनि पाप चि॥३६॥
म्हणूनि घात बंधूंचा आम्हा योग्य नव्हेचि तो।
आम्हीं स्वजन मारूनि सुखी व्हावे कसे बरें ॥३७॥
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निर्णय जब ऐसा हो कि वह अपनी इच्छा के अनुसार है किंतु मन में कहीं ना कहीं संशय है कि 'क्या यह निर्णय योग्य है?' तब वह व्यक्ति ऐसा निर्णय लेने के अपने कारण बताता है, ऐसा निर्णय लेने से होनेवाले लाभ गिनाता है और ऐसा निर्णय ना लेनेपर क्या (भयंकर अनर्थ) हो सकता है यह सब (बढ़ाचढ़ाकर - exaggerating) बताता है। हेतु यह होता है कि दूसरे व्यक्ति को यदि यह निर्णय अच्छा ना भी लगा हो तब भी वह विरोध नहीं कर पाएं।

अर्जुन यहीं कर रहे है परंतु वह तो यह सब श्रीकृष्ण से कह रहें है इसलिए उनके कथन में अत्यंत विनम्रता है , मधुरता है। उनका भाव अनुरोध करने का है, कुछ तो गिडगिडाने जैसा है, या फिर वैसा जैसे नन्हा बालक माता के पास जाकर एकदम बेबाकी से अपनी पीडा बता दें ! 
वहाँ कोई संकोच नहीं होता है.. 
किसी के झिडकने का भय नहीं होता है...
किसी के कुपित होने की आशंका नहीं होती है...
केवल विश्वास ही विश्वास है कि 'मैंने अपनी पीडा , अपनी समस्या बता दी है, अब समाधान तो मिल ही जाएगा।'

श्रीकृष्ण अर्जुन के सखा है। सखा वह द्रौपदी के भी है।
यह संबंध अत्यंत दुर्लभ ही नहीं , एकमेवद्वितीय है। ऐसा अन्य कोई उदाहरण नहीं है कि इतने समर्थ, विद्वान पतिपत्नी का सखा एक ही व्यक्ति हो ! 
और अर्जुन - द्रौपदी एक दूसरे से इतना अधिक प्रेम करते है उसके पश्चात भी उनके मन का बहुत बडा भाग श्रीकृष्ण द्वारा व्याप्त है।

नन्हा बालक माँ से जैसे हठ करता है और अपनी बात मनवाना चाहता है वैसे ही युद्ध ना करने के लिए अर्जुन भी श्रीकृष्ण से जैसे हठ कर रहें है। 

अर्जुन कह रहें है कि 'कौरव अत्याचारी तो है किंतु वह हमारे भ्राता है, इसलिए उनकी मृत्यु का कारण बनना पाप है। 
'अपनों' की मृत्यु का कारण बनकर हम कैसे सुखी हो पाएंगे यह अर्जुन की व्यथा है।
अर्जुन के मन की निर्मलता , क्षमाशीलता और प्रेम उनके इस प्रश्न से स्पष्ट रूप से दृश्यमान (visible) होती है।
एक और कौरव है जो पाण्डवों पर सदैव अन्याय करते रहें है और घात लगाकर अत्यंत क्रूर पद्धति से उनके मृत्यु के लिए जाल बिछाने में भी उन्हे कोई  संकोच नहीं है।
और यहाँ अर्जुन है जो उन्हे 'स्वजन' कह रहें है और दुखी हो रहें है कि यह कैसा समर (युद्ध)है जिसमें शत्रुपक्ष में खडे संबंधियों पर शस्त्र चलाने का प्रसंग आ सकता है !
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क्रमश :
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