हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४८
जय श्रीराम 🚩🚩 🕉️ श्री परमात्मने नमः श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २ --------------------------------------------------------- मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुखःदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ।।१४।। ------------------------------------------------------- गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे ) शीतोष्ण विषय-स्पर्श सुख-दुःखात घालिती। करीं सहन तू सारें येती जाती अनित्य ते ॥१४॥ ------------------------------------------------------- श्रीभगवान अर्जुन को देह और उससे बद्ध अनुभवों की क्षणभंगुरता (temporary existence) का बोध करा रहें है। वह अर्जुन को बता रहे है कि आत्मा जब देह धारण कर लेती है तब देह भौतिक सृष्टी के नियमों के अधीन हो जाता है किंतु देह के अनुभवों का आत्मा के साथ बंधना आवश्यक नहीं है। क्योंकि आत्मा जब देह में निवास कर रहीं होती हैं तब भी आत्मा का अस्तित्व देह से पृथक ही होता है। इसलिए देह के अनुभव आत्मा को लिप्त नहीं कर पातें है। इसिलिए भगवान उपदेश कर रहें है कि देह द्वारा लिए जानेवाले सारे ही अनुभव क्षणिक है, तात्कालिक है, अतः उन अनुभवों से मिलनेवाले सुख और ...
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