हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २३३
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।।४४।।
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गीताई ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
ज्यांनी बुडविले धर्म कुळाचे त्यांस निश्चित।
नरकी राहणे लागे आलो ऐकत हे असे॥४४॥
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अध्याय १ः श्लोक ४४ : भाग २
स्वर्ग और नर्क यह संकल्पनाएँ केवल हिंदु धर्म में नहीं है, अन्य धर्मों में भी है। जैसे ख्रिश्चन धर्मी Heaven / Hell मानते हैं, मुस्लिम धर्मी जन्नत / जहन्नम कहतें है।
स्वर्ग और नर्क इन कल्पनाओं में भौतिक सुख / यातनाएँ निहित है। स्वर्ग मे कल्पवृक्ष है अर्थात यह स्थान मन की प्रत्येक इच्छा पूर्ण होने के लिए है।
स्वर्ग का भाग्य पुण्यवान व्यक्ति को मिलता है और जिसने जितने अच्छे कर्म किए हो उसी अनुपात में मिलता है।
नर्क में यातनाएँ है। भौतिक जीवन में हुए अपराधों के लिए यहा दण्ड मिलता है। अपराध की तीव्रता के अनुसार दण्ड की तीव्रता बढती है जो यातना की सीमा तक जा सकती है।
इसमें दुर्गंधी युक्त वातावरण, उबलते तेल में डालना, शूल चुभोना आदि अनेक यातनाओं का वर्णन किया जाता है।
हममें से कोई नहीं जानता है कि स्वर्ग और नर्क वास्तव में क्या होता है । मृत्यु के पश्चात आत्मा की यात्रा के संबंध में अनेक मत हम सुनते है किंतु इसमें सत्य क्या है कोई नहीं बता सकता है।
हिंदु धर्म के अनुसार स्वर्गसुख के अनुभव के पश्चात आत्मा को पुनः पृथ्वीवर जन्म लेना होता है जो उसके पूर्वजन्म के फल के अनुसार होता है। क्योंकि उसका जितना पुण्य है उतना ही स्वर्गसुख उसे मिलेगा।
परंतु स्वर्ग की प्राप्ती हिंदु धर्मानुसार अंतिम आकांक्षा नहीं होती है। किसी भी मनुष्य के लिए मोक्षप्राप्ती यह अंतिम धेय्य माना गया है। मोक्ष अर्थात आत्मा का ईश्वर में विलीन होना। इसके पश्चात पुनः पुनः जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है। श्रीमद् आदि शंकराचार्य रचित चर्पटपञरिकास्तोत्र में उन्होने कृष्णमुरारी से प्रार्थना की है -
"पुनरपि जननं पुनरपि मरणं
पुनरपि जननि जठरे शयनम्
इह संसारे खलु दुस्तारे
कृपया पाहि मुरारे "
( अर्थ: जन्ममृत्यु के निरंतर चलनेवाले चक्र में पुनः पुनः जन्म लेना होता है , पुनः पुनः मृत्यु होती है। पुनः जन्म लेने के लिए माता के उदर (पेट) में (अर्थात उस संकरे - narrow - स्थान पर दीर्घ काल तक) निवास करने की कठिन स्थिति झेलनी पडती है । उस एक जन्म में भी अनेक समस्याएँ , कष्ट , यातना झेलकर मृत्यु के पश्चात पुनः उसी जन्म मृत्यु के फेर में मनुष्य घूमता रहता है । इस अतिकष्टकारी यात्रा का अंत करने की कृपा, हे मुरारी, आप हम पर किजिये।
साक्षात आदिशंकराचार्य यहाँ जन्ममृत्यु के चक्र से मुक्ति पाने की कामना कर रहे है। ऐसी मुक्ति को मोक्ष कहा जाता है।
हिंदु धर्म के अनुसार किसी भी मनुष्य की अंतिम आकांक्षा मोक्ष प्राप्ती की होती है अथवा होती चाहिए।
किंतु मोक्ष प्रप्ति यह गुरु के मार्गदर्शन में अनेक जन्मों की अखण्ड साधना के पश्चात ही हो सकती है। और गुरुकृपा की प्राप्ति के लिए पुण्य का संचय चाहिए।
अनेक जन्मों के पुण्य का धन जब अत्याधिक हो जाता है तब ईश्वर उस मनुष्य को अपने आप में विलीन कर लेते है अर्थात मोक्ष प्रदान करते है।
किंतु मोक्षप्राप्ती तो अनेक मानवजन्मों में किए गए पुण्य के पश्चात मिलेगी, पहले स्वर्गसुख प्राप्त करने जितनी पुण्यसंपत्ति तो हो !
जैसे हम बैंक से पैसे निकालते है तब उसमें balance होना आवश्यक होता है वैसेही मृत्युपश्चात स्वर्गप्राप्ति के लिए पुण्य का balance आवश्यक होता है।
किंतु जो अपने कुल परंपरा नहीं निभाएंगे, वह अपने कर्तव्य से विन्मुख होने के अपराध में नर्क प्राप्त करेंगे। जब स्वर्ग में पहुँचने तक का पुण्य ही जमा ना हो, तब मोक्ष की कामना कैस की जा सकेगी ?
अर्जुन को चिंता है कि वर्णसंकर के इतने गंभीर अपराध का जो भागी हे उसे नर्क प्राप्त होना निश्चित है। और युद्ध में सहभाग के कारण अर्जुन अपने आप को भी अपराधी ही मान रहें है। वह पूछ रहें है की यह सब जानते हुए भी युद्ध करने का पाप करते रहना कैसे समर्थनीय हो सकता है ?
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क्रमश :
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