हिंदु धर्मसंस्कार🚩 : भाग २२२

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ॐ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । 
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥३२॥

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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
नकों जय नकों राज्य नकोत मज ती सुखे ।
राज्ये भोगे मिळे काय किंवा काय जगूनि ही ॥३२॥
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अर्जुन अधिकाधिक शोकमग्न हो रहें है।
अब वह कह रहें है कि 'मुझे युद्ध में विजय भी नहीं चाहिए । क्या करूं इस विजय का ? विजयी होकर तो राज्य ही मिलनेवाला है। और राज्य मिलने का अर्थ हुआ सुख सुविधाएं प्राप्त होना , भोगविलास के अधिक साधन उपलब्ध होना। परंतु ऐसे उपभोग का क्या करना है ? क्यूं चाहिए इतना राजसी सुख ?'

उनकी त्याकुलता जैसे जैसे बढ रहीं है, वैसे वैसे उनकी वृत्ती और स्वभाव में विरक्त होने का जो अंग है वह उभर कर आ रहा है।
वह आगे कह रहें है कि 'राज्य का सुख मिलने का विचार तो क्या, मुझे तो लगता है कि अब प्राण धारण कर और अधिक जीवन जीने का भी कोई अर्थ नहीं है।'

अर्जुन के लिए यह प्रथम युद्ध नहीं है , उन्होने युद्ध में  जिवितहानी देखी भी है और प्रजारक्षण और दुष्टनिर्दालन के क्षात्रधर्म / राजधर्म के अंतर्गत युद्ध में शत्रुओं को मार गिराया है !
क्योंकि क्षत्रिय होने का और क्षात्रतेज प्राप्त करने का अर्थ ही यह है कि आवश्यकता होने पर क्षत्रिय को युद्ध करना होगा अर्थात शत्रु का प्राण हरण भी उस में निहित है (implied)।

और अर्जुन के लिए यह पहला अवसर भी नहीं है जब वह अपने परिजनों से युद्ध करेंगे !
द्रौपदी स्वयंवर में विजय प्राप्ति के पश्चात जब उपस्थित राजसमूह ने संग्राम प्रारंभ किया तब भी दुर्योधन अर्जुन और भीम के विरुद्ध पक्ष में थे।

वनवासकाल में जयद्रथ ने द्रौपदी का अपहरण किया था। जयद्रथ दुःशला का पति है , सिंधु देश का राजा। दुशःला दुर्योधन की सगी बहन अर्थात पाण्डवों की चचेरी बहन है। तब भी तो जयद्रथ को पराजित कर पाण्डवों ने द्रौपदी की रक्षा की थी। परंतु अर्जुन ने जयद्रथ के प्राण हरण नहीं किए, उसके केशों पर पाट निकालकर (दण्ड देने के लिए विशिष्ट पद्धति से काटना) से  उसे अपमानित किया और मुक्त कर दिया।

मत्स्य देश पर दुर्योधन ने जब आक्रमण किया तो  कौरवसेना में पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य भी थे।

किंतु इन सारे संग्रामों में अर्जुन का गाण्डीव धनुष्य बाणों की भयंकर वर्षा करता रहा था। अर्जुन का न मन काँप रहा था न हाथ !

परंतु अब, प्रचंड संख्या में खडी कौरवसेना में ना केवल आदरणीय वयोवृद्ध अपितु समवयस्क भ्राता और आयु में कनिष्ठ पुत्र और पौत्र देखकर अर्जुन का मन डगमगा रहा है !
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क्रमश :
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