हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २३४
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः।।४५।।
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गीताई ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
अरेरे केवढे पाप आम्ही आरंभिले असे।
लोभे राज्य सुखासाठी मारावे स्वजनांस जे॥४५॥
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अर्जुन की मनस्थिति लंबक के समान दोलायमान है (His emotions replicate a pendulum)।
कभी वह दुख के भार तले दबे दिखाई देतें हैं , कभी उनकी निराशा उभर कर आती है , कभी वह ज्ञान की बात करते है और कभी त्याकुलता से कृष्ण से शंकाएँ पूछने लगते है !
अब वह त्याकुल होकर श्रीकृष्ण से कह रहे है कि 'युद्ध के परिणाम हम जानते है फिर भी हम कितनी धृष्टता (ढिठाई) से पाप कर रहें है। युद्धसिद्ध खडे शत्रुपक्ष में हमारे ही कुल के परिजन है, मित्र / स्वजन है यह हम देख रहें है फिर भी इनसे युद्ध करने की पापी इच्छा कर हम अभी भी रणक्षेत्र में खडे है , कितने पापी है हम!'
युद्ध करने की , विजयी होकर राज्यकर्ता बनने की इच्छा अर्जुन के मन से पूर्णतः नष्ट हो गयी है। वह चाहतें है कि युद्ध ना हो और उनके परिजन , मित्र सब सुरक्षित रहें। इतने भयंकर मनुष्यसंहार की संभावना देखकर अर्जुन जैसे धीरगंभीर , संतुलित और प्रगल्भ योद्धा की बुद्धी भी भ्रमित हो गई है (confused)।
सामान्य व्यक्ति के जीवन में भी ऐसे कितने प्रसंग आते है जब उनका मन डगमगा जाता है। वह जानता है कि सत्य और न्याय का मार्ग कौनसा है, कभी कभी वह सारी बाधाओं को झेलकर उस मार्ग पर चलने का निश्चय भी करता है किंतु जब देखता है कि उसके अपने परिजन ही उसके मार्ग की बाधा बनकर खडे है तब वह अपना धैर्य खोकर अन्याय / अधर्म के सामने स्वयं को विवश मान लेता है।
उदाहरण के लिए हम अनेक बार लोगों को प्राणियों को पथ्थर फेंककर मारते हुए देखते है। हमारा धर्म है कि इस प्रकार का अत्याचार रोकने का प्रयास करें। किंतु हम सोचते है कि वह तो पडोसी है , सगेसंबंधी है , उनसे कैसे कहें कि यह अत्याचार ना करें ? संबंध बिगड जाएंगे...
कभी कभी हमारे अपने परिवार में, अथवा निकट सगेसंबंधियों में (family or extended family) किसी पर परिवार के सदस्यों द्वारा ही अन्याय / अत्याचार हो रहा है यह हम जानते है। फिर भी हम पिडित व्यक्ति की सहायता करने से झिझकते है। हम सोचते है कि वह तो पडोसी है , सगेसंबंधी है , उनसे कैसे कहें कि यह अत्याचार ना करें ? संबंध बिगड जाएंगे...
कभी किसी परिवार में भाईबहनों में सम्पत्ति को लेकर विवाद होता है, जैसे कोई विवाहित बहन को संपत्ति में हिस्सा नहीं देना चाहता है । बाकी भाईयों में से कोई एक न्यायपूर्ण बंटवारा करना चाहता भी है तब भी अनेकों बार डरकर चुप रहता है कि अबतक जिन भाईयों के साथ अच्छे संबंध थे, यदि न्यायपूर्ण बँटवारे का मुद्दा उठा लिया तो वैसे नहीं रह पाएंगे।
परंतु इस प्रकार अन्याय को देखते रहना भी अन्याय में भागीदारी है।
अन्याय के सामने डंटकर खडा होना कभी भी सरल नहीं रहा है, न कभी रहेगा। जो अन्याय कर रहा है वह या तो सोच समझकर वैसा करता है या उसने मान लिया होता है कि वह तो अन्याय कर ही नहीं रहा है।
दोनों ही स्थितियों में विरोध करनेवाले का मार्ग कठिन होता है। सामनेवाले पक्ष का क्रोध तो झेलना ही पडेगा। संबंध टूट भी सकते है।
हम सब साधारण मनुष्य है । हमें अर्जुन समान कुरुक्षेत्र पर युद्ध नहीं करना पडेगा। परंतु हमारे दैनंदिन जीवन में भी न्याय-अन्याय, कर्तव्यपूर्ति-कर्तव्य की उपेक्षा, धर्म-अधर्म इनमें से एक पर्याय स्वीकारने की स्थितियाँ आती है।
न्याय - धर्म - कर्तव्य को अनदेखा कर शांतिपूर्ण जीवन बिताना सरल है और कदाचित सुखद भी !
किंतु ऐसी स्थितियों में ही हमारे चरित्र की, तत्वनिष्ठा की परिक्षा होती है। हम पीछे हटेंगे अथवा आँख मूंद लेंगे तो हम श्रीमद् भगवद् गीता के उपदेश की ही उपेक्षा कर रहें होंगे क्योंकि कठिन स्थिति अथवा संकट से घबराकर कर्तव्यच्युत होना गीता के उपदेश के विरुद्ध है ❗
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क्रमश :
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