हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २३५
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय १
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यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥४६॥
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥४७॥
🕉️ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
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गीताई ( मराठी अनुवाद: आचार्य विनोबा भावे)
त्याहुनि शस्त्र सोडूनि उगा राहीन तें बरें ।
मारोत मग हे युद्धीं शस्त्रांनी मज कौरव॥४६॥
संजय म्हणाला
असे रणांत बोलुनि शोकावेगात अर्जुन।
धनुष्य-बाण टाकूनिं रथीं बैसूनि राहिला॥४७॥
अर्जुनविषादयोग नामक प्रथम अध्याय समाप्त
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श्रीमद् भगवद् गीता के 'अर्जुनविषादयोग' नामक प्रथम अध्याय के यह अंतिम दो श्लोक है।
गीता के १८ अध्यायों में प्रत्येक का एक नाम है। उस अध्याय के विषय का अर्थ हम इस नाम से समझ सकते है।
यह पहला अध्याय है जिसमें सभी यो्द्धा युद्धसज्ज होकर कुरुक्षेत्र में आए हैं इसका वर्णन है।
युद्ध की पूर्ण सज्जता अर्जुन की भी थी। परंतु शत्रुपक्ष में खडे परिजन - स्वजन - गुरुजन इन्हे देखकर अर्जुन का मन शोक, निराशा, पाप का भय इन भावनाओं की लहरों पर कंदुक (गेंद= ball) जैसा दिशाहीन भटकने लगा।
अब अर्जुन की भावनाएँ अति तीव्र हो गई है। वह कह रहें है कि 'जिनसे युद्ध नहीं करना चाहिए उनसे ही युद्ध करने का संकट आया है। किंतु अब मैं शस्त्र का त्याग कर देता हूँ, मैं युद्ध नही करूंगा, चाहे यह सब कौरव अपने अपने शस्त्रों से मुझे मार दें !'
यह कहते हुए अर्जुन ने अपने शस्त्र त्याग दिए और शोकमग्न हो कर वह रथ में बैठ गए।
अब तक अर्जुन एक के पश्चात एक प्रश्न पूछ रहें है, युद्ध ना करने के अपने निर्णय का समर्थन कर रहें है , कभी शोकसंतप्त (extremely unhappy ) हो रहे है, कभी पाप की संभावना से भयव्याप्त है और अब तो वह हठी बालक समान अडकर बैठे है।
उनकी भावनाओं के उद्रेक के श्रोता उनके सखा है , साक्षात भगवान श्रीकृष्ण !
इसलिए अर्जुन के मन में कोई संकोच नहीं है, झिझक अथवा भय नहीं है।
नन्हा बालक जैसे मातापिता के सामने नि:संकोच नग्नावस्था में रह सकता है वैसे ही अर्जुन के मन की परतें (Layers) गिर रहीं है और उनकी भावनाओं का अनावृत्त (bare) दर्शन श्रीकृष्ण को हो रहा है।
कृष्ण ने अभीतक एक शब्द भी नहीं कहा है।
कैसे अद्भुत है कृष्ण !
उनके कथन में आदर्श व्यवहार के लिए उपदेश है और उनके मौन में आदर्श व्यवहार का उदाहरण है !
रोग का निदान करने के लिए डॉक्टर रोगी से उसके लक्षण ध्यानपूर्वक सुनते है क्योंकि रोगनिदान की अचूकता पर ही उपचार का यश निर्भर है।
कुरुक्षेत्र के समरांगण में श्रीकृष्ण अर्जुन का कथन सुन रहें है। क्योंकि वह अर्जुन के मार्गदर्शक है। यदि अर्जुन को सुयोग्य दिशादर्शन कराना है तो प्रभु को उनकी मनोदशा पूर्णत: समझनी होगी। अतः स्वयं के श्रेष्ठत्व को दुर्लक्षित कर अर्जुन का कथन सुनना होगा !
प्रभु यहाँ आदर्श श्रोता (good listener) कैसा होना चाहिए इसका उदाहरण अपने व्यवहार से प्रस्तुत कर रहें है।
वह आनेवाले भयंकर संकट को देख रहें है। ज्वालामुखी का विस्फोट होनेपर उसका लावा सर्वनाश कर देता है, वैसेही अर्जुन का यह भावावेश (sea of emotions) पाण्डवों के लिए घातक सिद्ध होनेवाला है।
पाण्डव पक्ष में वीरों की कमी नहीं है किंतु अर्जुन के बिना युद्ध में विजय असंभव है !
अर्जुन का निश्छल मन, उनकी निस्वार्थ वृत्ती, सम्पत्ति और सत्ता के प्रति वैराग्यभाव, परिजनों के प्रति आदर और प्रेम इन भावनाओं ने श्रीकृष्ण को मोहित अवश्य किया होगा क्योंकि यहीं भावनाएँ मनुष्य में देव तत्व के वास का प्रतिक है। किंतु ऐसी आदर्श भावनाएँ रखने की आदर्श स्थिति पाण्डवों को नही मिली है। लोभी - कपटी दुर्योधन और उसके संबधियों ने पाण्डवों को युद्ध करने पर बाध्य किया है , इसलिए अब करुणा और प्रेम को त्यागकर वीररस का अंगीकार करना यहीं अर्जुन का धर्म है !
और प्रभु के लिए धर्म की रक्षा यहीं अंतिम धेय्य है। इस धेय्य के साधन है पाण्डव !
युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राज्य दिलाना यह साध्य नहीं है , यह धर्मरक्षा की घोषणा का साधन हैं (The goal of making Yudhishthir king of Hastinapur is not to establish him, but rather to strengthencommitment towards Dharmaraksha) !
इसलिए अद्भुत संयम और धैर्य से कृष्ण ने अर्जुन की भावनाओं के ज्वार को (tide) देखा है। क्योंकि अर्जुन की भावनाओं को योग्य दिशा देकर ( by channelising his emotions) ही श्रीकृष्ण धर्मरक्षा के लिए प्रतिबद्ध होने के लिए समाज को प्रेरित करेंगे !
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'अर्जुनविषादयोग' नामक प्रथम अध्याय समाप्त
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अध्याय २ : क्रमश :
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