हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २३८
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ।।४।।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥५॥
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गीताई (मराठी अनुवाद: आचार्य विनोबा भावे)
अर्जुन म्हणाला
कसा रणांगणी झुंजुं भीष्म-द्रोणांविरुद्ध मी।
ह्यांस बाण कसे मांरू
आम्हां हे पूजनीय किं॥ ४॥
न मारितां थोर गुरुस येथे
भिक्षा ही मागुनि भले जगावे।
हितेच्छु हे ह्यांस वधूनि भोग
भोगू कसे भंगुर रक्त-मिश्र॥५॥
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अध्याय २ः श्लोक ४ व ५ - भाग १ः
अर्जुन को भ्रामक कल्पनाओं के मायाजाल से बाहर खींचकर उन्हे उनके कर्तव्य का स्मरण दिलाने के लिए श्रीभगवान ने उनकी वीरता को, उनके क्षात्रधर्म को ललकारा। समाज के सामने आदर्श प्रस्थापित कर किर्तीमान होने की बात भी कही।
किंतु अर्जुन के मन पर अभी भी गहरा अवसाद छाया हुआ है (state of deep depression)l इसलिए वह श्रीकृष्ण की बात का भी प्रतिवाद कर रहें है।
अर्जुन ने अत्यंत करुण हो कर श्रीकृष्ण से कहा, "हे मधुसूदन, मैं यहाँ पितामह भीष्म और गुरु द्रोण से कैसे युद्ध कर सकता हूँ ? वह हमारे लिए पूजनीय है अरिसूदन !"
मनुष्य की बुध्दी पर माया का आवरण पड जाने से उसे जो स्पष्ट रूप से सम्मुख आ रहा है उसका भी अर्थ नहीं समझता इसका साक्षात उदाहरण है अर्जुन का यह प्रश्न !
उन्होंने श्रीकृष्ण को मधुसूदन और अरिसूदन इन दो नामों से संबोधित किया है । मधुसूदन अर्थात मधु नामक दैत्य का नाश करनेवाले (भगवान विष्णु) और अरिसूदन अर्थात शत्रुओं का नाश करनेवाले।
स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण का वास्तव स्वरूप अर्जुन जानते है। वह जानतें है कि दैत्य मधु का वध करने वाले भगवान श्रीविष्णु ही श्रीकृष्ण के रूप में आएं है। ऐसे में उनकी आज्ञा पूर्ण रूप से मानना यहीं एकमात्र मार्ग है। किंतु अर्जुन यह बात समझकर भी नहीं समझ रहें है। वह प्रत्यक्ष भगवान की आज्ञा पर ही शंका प्रकट कर रहें है और एक प्रकार से कह रहें है कि श्रीकृष्ण की बात मानने से पाप होगा।
माया का आवरण मनुष्य की बुद्धी को कितना दिशाहीन करता है उसका यह उदाहरण है।
अब तक अर्जुन सदैव श्रीकृष्ण की बात मानते आएं है। कठिन से कठिन स्थिति में उन्होंने श्रीकृष्ण को गुरु मानकर आज्ञापालन ही किया है। कृष्ण और अर्जुन समवयस्क थे (of same age) किंतु उनके लिए अर्जुन का भाव सदैव लीनता का ही रहा है और श्रीकृष्ण के संकेत अथवा सुझाव (indications / suggestions) को वह आदेश ही मानते रहें है।
प्रसंग द्रौपदी के साथ पाँचो भ्राताओं के विवाह का निर्णय लेने का हो, खाण्डव-वन के दाह का हो अथवा सुभद्रा हरण का हो, मार्गदर्शक और सूत्रधार श्रीकृष्ण ही थे और अर्जुन विनम्रता से आज्ञापालन करते रहें है। क्योंकि वह जानते है श्रीकृष्ण ना केवल उनके शुभचिंतक, मार्गदर्शक और गुरु है , वह तो साक्षात भगवान विष्णु का मानवी अवतार है।
अर्जुन यह भी जानतें है कि इस युद्ध को टालने के लिए श्रीकृष्ण ने कितने प्रयत्न किए थे। वह पाण्डवों के दूत बनकर हस्तिनापुर की राजसभा में गए थे और दुर्योधन को प्रस्ताव दिया था कि 'इन्द्रप्रस्थ के बदले कोई भी पाँच ग्राम ही पाण्डवों को दे देंगे तब भी वह उसे स्वीकार करेंगे और युद्ध नही करेंगे।'
दुर्योधन ने यदि यह बात मान ली होती तो युद्ध ही ना होता। किंतु उसने यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया कि 'पाँच ग्राम तो क्या, सुई की नोक जितनी जमीन भी नहीं दूंगा।'
दुर्योधन की धृष्टता की सीमा नहीं है। उसने दूत के रूप में आए श्रीकृष्ण को ही बंदी बनाने का प्रयत्न किया था।
अब यदि कृष्ण कह रहें है कि ऐसे समय में शस्त्रत्याग करने का, रणक्षेत्र छोडने का पापी विचार अर्जुन ना करें तब अर्जुन को अपने विचारों की डगमगाती नौका को स्थिर कर अपने गांडीव धनुष्य पर प्रत्यंचा चढा लेनी चाहिए।
किंतु पितामह, गुरु इनके मोह ने पार्थ को इतना जकड लिया है कि जैसे नदी के पात्र में अनिर्बंध बढ गई लताएँ तैराक के पैरों का पाश बनकर उसके डूबने का कारण बन सकती है वैसे ही अर्जुन इस मोह के कारण जड़ (hypotised /stranded on the island of illusions) हो गएं है ।
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अध्याय २ः श्लोक ४ व ५ - भाग २ : क्रमश :
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