हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २३९

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । 
इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ।।४।।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् 
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव 
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥५॥
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गीताई  (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)

अर्जुन म्हणाला
कसा रणांगणी झुंजुं भीष्म-द्रोणांविरुद्ध मी।
ह्यांस बाण कसे मांरू 
आम्हां हे पूजनीय किं॥ ४॥
न मारितां थोर गुरुस येथे
भिक्षा ही मागुनि भले जगावे।
हितेच्छु हे ह्यांस वधूनि भोग
भोगू कसे भंगुर रक्त-मिश्र॥५॥
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अध्याय २ः श्लोक ४ व ५ - भाग २ :
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अर्जुन अपने पितामह से अत्याधिक प्रेम करते है, उनका सम्मान करतें है, भीष्म पितामह अर्जुन के लिए पूजनीय है !
और क्यों ना हो ?
पाण्डु के स्वर्गवास के पश्चात कुन्ती जब अपने पाँच बच्चों के साथ हस्तिनापुर लौटी थी तब प्रजा आनंदित हुई थी परंतु राजप्रासाद में उनका मन से स्वागत नहीं हुआ था। धृतराष्ट्र और दुर्योधन के मन में क्रोध था और भय भी था कि कहीं भविष्य में पाण्डव राज्य ना मांग ले।
इसलिए कुन्ती और उसके पुत्रों के साथ कुछ उपेक्षा और कुछ अपमान का व्यवहार किया गया। इस स्थिति का सामना माता कुन्ती ने अपने स्वभाव के अनुरूप धैर्य और संयम से किया।
राज्य पाण्डु का था इसलिए कुन्ती हस्तिनापुर की महारानी हुआ करती थी। पाण्डु की मृत्यु होने के कारण अब युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करना चाहिए था, क्योंकि उनकी आयु तब साधारण १६ वर्ष की थी। ऐसे में कुन्ती को राजमाता का सम्मान प्राप्त होता और पाण्डवों को भी सुखसुविधा का जीवन मिल पाता। 
किंतु धृतराष्ट्र ने सत्ता का स्वाद चख लिया था इसलिए वह अनजान बना रहा और पाण्डवों से साथ प्रकट दुर्व्यवहार यदि ना भी किया हो तब भी हस्तिनापुर उन्हे मनःशांति ना मिले ऐसा व्यवहार तो था ही ।

इन सारी प्रतिकूलताओं के मध्य में पाण्डवों को वात्सल्य की छाया पितामह भीष्म और महात्मा विदुर ने दी थी।
पितामह महावीर और ज्ञानी अवश्य थे किंतु उनकी अतुलनीय क्षमताएँ और उनके निश्चयी स्वभाव ने उनके मन की कोमलता को सुखाया नहीं था। अपने इन पिताहीन पौत्रों से वह अत्यंत प्रेम करतें रहें। वह देख रहें थे कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन पाण्डवों पर अन्याय कर रहें थे, किंतु परिवार की शांति और एकता के लिए पाण्डव उस अन्याय को सहन कर रहें थे। 
कुन्ती और पाण्डवों की अद्भुत सहनशीलता देखकर पितामह का वात्सल्य उनपर और भी अधिक उमड़ता रहा।
...क्योंकि पितामह भी उसी मिट्टी के बनें थे। उन्होंने भी तो पिता शान्तनु की इच्छा पर कोई प्रश्न नहीं पूछा, ना ही विरोध जताया, उन्होंने बस जीवन में सबसे बडा त्याग कर राजा बनने का और गृहस्थजीवन जीने का सुयोग सदा के लिए त्याग दिया। उसके पश्चात भी अपनी प्रतिज्ञा के लिए उन्होने कभी भी अभिमान नहीं पाला। उन्होने   चित्रांगद / विचित्रवीर्य / पाण्डु से यह कभी नहीं कहा कि 'मेरा राज्य था, मैने छोडा इसलिए तुम्हे मिला'।

भीष्म हस्तिनापुर में रहे। राजसभा के सम्मानित सदस्य का कर्तव्य  निभाते रहें, राज्यरक्षा के लिए / युद्ध में लड़ते रहे। जैसे , सत्यवती - शांतनु का ज्येष्ठ पुत्र चित्रांगद जब हस्तिनापुर का सम्राट बना तब बिना किसी कारण से उसने गंधर्व चित्रांगद के साथ शत्रुता कर उसे युद्ध के लिए ललकारा था। छोटा मुँह बड़ी बात ही थी, इसलिए सम्राट चित्रांगद का पराजय निश्चित था। पितामह ने अहंकार नहीं पाला था जो यह कहते की 'मुझसे परामर्श किया नहीं और युद्ध कर रहें हो तो स्वयं ही लड़ लो '।
भीष्म ने सेनासहित धावा बोलकर चित्रसेन को धूल चटा दी थी। यह बात और है कि चित्रांगद की इस युद्ध में मृत्यु हो गई।

पाण्डवों के अज्ञातवास को भंग करने के लिए दुर्योधन ने मत्स्य देश पर आक्रमण किया था तब भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य भी उस सेना में थे। हस्तिनापूर की उस विशाल सेना को अकेले अर्जुन ने ही पराजित कर दिया था किंतु उसने भीष्म अथवा द्रोण का वध नहीं किया था। कर सकते थे, परंतु नहीं किया।

किंतु कुरुक्षेत्र का युद्ध उससे भिन्न था । यह निर्णायक युद्ध था। जिसका मन विकल होगा, जो शत्रुपक्ष के लिए दया अथवा प्रेम का भाव रखकर उनक वध करना टाल देगा, यह युद्ध उस का  अस्तित्व मिटा देगा।
इसलिए दोनो सेनाएँ पूर्णतः युद्धसज्ज होकर कुरुक्षेत्र पर खडी थी। सेनापतियों के संकेत पर तत्काल युद्ध का आरंभ होता और नातेसंबंधों का विचार किए बिना वीरों के अस्त्र शस्त्र शत्रुपक्ष के योद्धाओं का संहार करने लगते। यह स्वाभाविक ही नही, धर्मसम्मत भी था !
परंतु अर्जुन तो अर्जुन है ! अपने महापराक्रमी, महाज्ञानी, असामान्य त्यागमूर्ति पितामह (दादाजी) के लिए अर्जुन का प्रेम का अंत नहीं है।
इसलिए 'कैसे मैं पितामह पर शस्त्र चलाऊं' यह कहते हुए उनकी आँखो में अश्रु आ रहें है और जैसे उनका शक्तिपात ही हो रहा है ।
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श्लोक ४ व ५ - भाग ३ः क्रमशः
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