हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २४०

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
----------------------------------------
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥६॥
-------------------------------------------
गीताई ( मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)

ह्यांचा चि व्हावा जय आमुचा की
कशात कल्याण असे न जाणों ।
मारूनि ज्यांते जगणे न इच्छूं
झुंजावया तेचि उभे समोर ॥६॥
---------------------------------------
श्रीकृष्ण के जीवन से अर्जुन भलीभांति परिचित है। 
धर्मरक्षा के लिए, धर्म की पुनर्स्थापना के लिए कृष्ण के मार्ग में उन्ही के आत्मीय जनों ने कितनी दुविधाएँ उत्पन्न की थी वह भी अर्जुन जानते है।
प्रत्येक समय श्रीकृष्ण ने निजी संबंधों को नहीं, बल्कि धर्मरक्षा का हा मार्ग चुना था यह भी अर्जुन जानतें है।

किंतु अपने सगेसंबंधी, गुरुजन आदि के लिए प्रेम और आदर की अर्जुन की भावनाओं ने अब जैसे भयंकर आँधी का रूप ले लिया है। चक्रवात (cyclone) के कारण जैसे सामने पडीं हुई वस्तु भी दिखाई नहीं देती है वैसे ही अर्जुन को सत्य-धर्म-न्याय का एकमात्र मार्ग (जो युद्ध से होकर ही जा सकता है) दिखाई नहीं दे रहा है।
वह गहरे अवसाद में (deep depression) में कह रहें है कि 'मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह युद्ध करना चाहिए या नहीं। यदि युद्ध कर भी लिया तो कल्याण किससे होगा, हमारे विजय से अथवा उनके विजय से, यह नही समझ पा रहा हूँ। क्योंकि जिन्हे मारने के पश्चात मेरी जीवन जीने की इच्छा ही नष्ट हो जाएगी, आज वही सब मुझसे युद्ध करने के लिए रणक्षेत्र में खडें है !'

वास्तव में अर्जुन की समस्या ही उसका उत्तर है। वह कह रहें है कि 'जिन्हे मार कर मेरी जीने की इच्छा ही नष्ट हो जाएगी, वह सब लोग आज हमसे युद्ध करने के लिए खडें है'।
स्पष्ट है कि अर्जुन को वह सब लोग अत्यंत प्रिय है जिनके लिए वह अपना सब कुछ त्यागने के लिए प्रस्तुत है, किंतु जो सब सामने युद्धसज्ज होकर खडें है वह अर्जुन के लिए अपना सर्वस्व त्यागना नहीं चाहते है !
कौरवपक्ष में ऐसे अनेक योध्दा है जिनकी अर्जुन से शत्रुता नहीं है, अर्जुन के लिए उनके मन में मृदु भावनाएं भी है परंतु अर्जुन के लिए वह सर्वस्व त्याग नहीं देंगे, अपनी इच्छाओं को अर्जुन से भी अधिक महत्व देंगे, अपना कर्तव्य क्या है यह ऐसे लोगों ने सोच रखा है जिस पूर्ण करने का प्रयत्न वह करेंगे ही करेंगे चाहे इसके लिए पाण्डवों से युद्ध ही क्यो ना करना पडे। वह मन में चाहे दुखी होते रहे परंतु पाण्डवपक्ष के पराजय के लिए पूर्ण क्षमता से लडेंगे।
अब वह अपनी इच्छा से युद्ध करें अथवा अनिच्छा से, परिणाम यही है कि वह सब कौरवपक्ष को बलवान बना रहें है।

और ऐसे लोगों के लिए अर्जुन अपना क्षत्रियधर्म भूल रहें है, उनके युद्ध ना करने से उनके चारों भ्राता और पत्नी द्रौपदी का घोर अपमान करनेवाले अत्याचारियों को शासन करने से पीछे हट रहे है और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि धर्म पर आए संकट के समय (दुष्टों का निर्दालन करने का) स्वयं का धर्म भूल रहे है !
....................................................
क्रमशः
.....................................................

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २१३

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४८

हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २०२