हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २४१
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥७।।
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क्रमशः
गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
दैन्यानें ती मारिली वृत्ती माझी
धर्माचे तो नाशिले ज्ञान माझें ।
कैसे माझे श्रेय होईल सांगा
पायांपाशी पातलों शिष्य भावे ॥७॥
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यद्यपि अर्जुन अभी भी निराश और दुःखी है और युद्ध करने के लिए इच्छुक नहीं हैं , किंतु यहाँ देखा जा सकता है कि धीरे धीरे धुंधलका (fog) छंट रहा है, और माया-मोह के जाल में जकडे अर्जुन को अपनी बद्धता का अथवा अपने विचारों के अतार्किकता (unreasonable) का कुछ कुछ आभास हो रहा है। इसलिए वह एकदम शरणागत हो गएं है और श्रीकृष्ण से कह रहें है कि ' मे री भीरुता (cowardliness) ने मेरे धर्म के ज्ञान को भी आहत किया है ।
अर्थात अर्जुन समझ रहें हैं कि भावनाओं की बाढ में उनकी मूलतः धर्मनिष्ठ - धर्मप्रिय - धर्मप्रण वृत्ती अवांछित (undesirable) दिशा में बह रही है।
अर्जुन कृष्ण से याचना कर रहें है कि 'मैं शिष्य बनकर आपकी शरण में आया हूँ । आप ही मार्गदर्शन किजिए और मेरा जिससे कल्याण हो ऐसा मार्ग मुझे बताइये !'
परिजनों के प्रति प्रेम - आदर अभी भी बहुत है अर्जुन में, किंतु अब धीरे धीरे उन्हे आकलन हो रहा है कि उनकी समझ में, तर्क में कहीं तो कुछ विसंगति है। इसलिए वह एकदम लीनता से जैसे प्रभुचरणों में झुक गएं है और उनका भाव कृष्ण के लिए है कि 'उठाइये मुझे, अब आप ही मुझे इस स्थिति से बाहर निकाल सकतें है क्योंकि मेरी बुद्धी तो मकडी के जाल में जैसे कीडा फंस जाता है वैसीही निचेष्ट हो गई है। मेरे मन को पलायनवादी विचारों ने घेर रखा है और में धर्माधिष्ठित कर्म से दूर जा रहा हूँ '।
इस कृष्णार्जुन संवाद में एक बात बडी ही सुंदर है। अर्जुन भावनाप्रधान हो गए है, अपनों का रक्त बहाने की कल्पना तक उन्हे कातर कर रहीं है और उनके मन में वैराग्य भावना उबलने लगी है।
भावनाओं का यह बवंडर (typhoon/ tornado) इतना गतिमान और शक्तिशाली है कि अर्जुन यह जानते हुए भी की सामने साक्षात विष्णुभगवान का मानवी रूप है अपनी ही रौ में बस बोलते जा रहे थे। इसमें रूदन (शोक) था, निराशा और दुख था, हताशा थी, प्रश्न थे और असहायता थी !
इस भावनाओं के चक्रवात (whirlwind) में अर्जुन ने जो कुछ भी कहा, प्रभु ने वह अधिकतर सुन लिया है ! बोलनेवाले को उन्होंने रोका नहीं और बस हलकासा टोका है किंतु अपन अधिकार का प्रयोग कर चुप नहीं कराया है !
प्रभु का व्यवहार दर्शाता है कि वह बहुत अच्छे समुपदेशक थे। किसी व्यक्ति की विचारधारा यदि अवांछित दिशा में बह रहीं हो अथवा वह पूर्णत: गलत निर्णय लेने का मन बना चुका हो, तो अपने अधिकार का प्रयोग कर डाँट-फटकार नहीं करना चाहिए, उल्टे उसके विचारों को विपरित दिशा में ले जानेवाले मूल कारण समझकर उनकी दिशा मोडने से (realignment of his/her thought process) उस व्यक्ति की मनोदशा का उपचार हो सकता है इसका उदाहरण भगवान ने हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया है।
इस सीख का उपयोग हम हमारे जीवन में भी कर सकते है। इसिलिए कहा जाता है कि भगवद्गीता कालातीत (timeless) है, इसका उपदेश प्रत्येक युग में सामान्य मनुष्य के लिए भी उपयुक्त है।
भगवान ने यदि एक आदर्श यहाँ प्रस्तुत किया है, तो अर्जुन ने भी एक और आदर्श प्रस्तुत किया है। भगवान बता रहें कि कैसे अपने अधिकार (position) का लाभ उठाकर दूसरों पर निर्णय थोंपना नहीं चाहिए बल्कि सहानुभूति से उन्हे सुयोग्य मार्ग की ओर मोडना चाहिए। अर्थात वह अपने अधिकार का अहंकार (ego) ना रखने का उदाहरण स्वयं प्रस्तुत कर रहें है।
दूसरी ओर अर्जुन ने भी अहंकाररहित वृत्ति/ विनम्रता का सुंदर उदाहरण सामने रखा है। वह महावीर है , विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है, अजेय (invincible) है किंतु अब, जब उन्हे आभास हो गया है कि उनकी सोच में कुछ तो गलत है, तो वह जैसे सीधे ही प्रभुचरणों में लोट गए है। उनके निवेदन का भाव यह है कि 'मैं आपका शिष्य हूँ। मेरा मार्गदर्शन किजिए , मेरा कल्याण जिससे हो ऐसे कार्य करने की बुद्धी आप ही मुझे दीजिए'।
क्या अर्जुन के व्यवहार में हमारे लिए सीख नहीं है ?
साधारणतया मनुष्य अपने मन में अहंकार, आढ्यता, दूसरे व्यक्तियों के प्रति मैली भावनाएं आदि पालते है। इन विषैली भावनाओं की जड़े इतनी गहरी और दृढ होती है कि संकट के समय में भी हम अपनी इन गलत धारणाओं के मायाजाल में उलझकर अपने हितैषीयों (well-wishers) को स्पष्टता से देख ही नहीं पाते है। हमें संकट से बाहर निकालने की क्षमता रखनेवाले लोग हमारे आसपास होते भी है, परंतु हम अपनी अकड के कारण उनसे सहायता की याचना नहीं करतें है, शरणागत भाव से उन अनुभवी - दयालु और बुद्धीमान व्यक्तियों को अपनी समस्याएं बताते ही नहीं है ! और अंततः अहंकार का यह अग्नि हमारे संकटों में इंधन का काम करता है।
इसलिए अर्जुन के यह अतिविनम्र भाव भी हमारे लिए सीख ही है।
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क्रमशः
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