हिंदु धर्मसंस्कार🚩 : भाग २४३

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप। 
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥९॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )

संजय म्हणाला
असें अर्जुन तो वीर हृषीकेशास बोलुनि।
शेवटी मी न झुंजेची या शब्दे स्तब्ध राहिला ॥ ९ ॥
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जैसे पतंगा (कीट) जलती हुई लौ (flame) पर स्वयं को लोटकर सर्वनाश कर लेता है वैसी अब अर्जुन की करनी है !
वह अभी तक तो केवल अपनी बात कह रहे थे, मुझे युद्ध करने की इच्छा हैं ही नहीं यह बता रहें थे, अपने निर्णय का कारण बताकर समर्थन कर रहें थे परंतु फिर भी कहीं ना कहीं श्रीकृष्ण से संवाद तो कर रहे थे। संकरा (narrow) ही सही किंतु संवाद का एक मार्ग खुला था। किंतु अब उन्होने अपना मन बना लिया है कि उन्हे युद्ध करना ही नहीं है। वह अब आगे ना कुछ कहेंगे ना कुछ सुनेंगे। 
उन्होने सीधे सपाट शब्दों में श्रीकृष्ण से कह दिया की 'अब मैं युद्ध नहीं करूंगा!' और वह स्तब्ध हो गए !

मरुस्थल (dessert) में जब रेत की आँधी (sandstorm) आती है तब उँट अपना मस्तक नीचे रेत में डालकर बैठे रहते है जिससे वह आँधी उन्हे क्षति पँहुचाएँ बिना उनके उपर से निकल जाती है। 
उँट मरुस्थल का ही जीव है, इसलिए संकट समय स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए प्रकृति ने उन्हे यह उपाय जन्मतः सिखाया है। 
कदाचित अर्जुन भी ऐसा ही सोच रहें है कि युद्ध यदि हो रहा है तब भी वह अपने सगेसंबंधी - गुरुजनों के प्रेम - आदरयुक्त भावनाओं की चादर ओढकर अधोमुख बैठे रहेंगे और युद्ध का वह भयंकर विनाशकारी चक्रवात उन्हे छोडकर निकल जाएगा।किंतु यह उपाय अर्जुन के लिए नहीं है। अर्जुन युद्ध ना करें तो पाण्डवपक्ष के विजय की संभावना जाती रहेगी और इस युद्ध के परिणाम विनाशकारी होंगे। 
अबतक तो वह विरुद्ध पक्ष के योद्धांओं की मृत्यु के विचार से व्याकुल हो रहें है। परंतु वह युद्ध ना करें तो पाण्डवपक्ष में ही कितने योध्दा बचेंगे? 
उनके अतिप्रिय भ्राता, राजा विराट जैसे हितैषी और समधी सभी का जीवन इस युद्धक्षेत्र में दांव पर लगा है और रेत में मुख दबाकर बैठे हुएं उँट के समान अर्जुन युद्ध को नकार रहें है ! 

अर्जुन की परिस्थिति और उनका निर्णय हमारे जीवन का प्रतिबिंब है। अनेकों बार हमें अपनी शक्ति और मनोबल जुटाकर कठिन स्थिति का सामना करने की आवश्यकता होती है किंतु हम परिणामों से डरतें है, जिनके सम्मुख खडें होकर प्रश्न करने पडेंगे उनसे भयभीत हुए रहते है। इनमें कभी हमारे कुटुंब के लोग हो सकतें है, कभी  मित्र अथवा पडोसी अथवा कार्यालय के सहकारी / वरिष्ठ अधिकारी हो सकते है। सबसे सरल उपाय स्वयं को बचाकर आँख मूंदकर निकल जाना होता है। दूसरों के साथ न्याय हो की अथवा अन्याय, हमें क्यों प्रत्येक समय पीडित व्यक्ति के साथ तनकर खडें हो जाएं यह सोचना सुविधाजनक हो सकता है किंतु क्या इससे हम श्रीकृष्ण के सम्मुख उनकी आँख में आँख डालकर खडें हो पाएंगे यह सोचने पर जो उत्तर मिलेगा वहीं हमारा मार्ग है !
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क्रमशः
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