हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४६

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। 
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥१२॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)

मी तूं आणिक हे राजे न मागे नव्हतों कधी।
तसें चि सगळें आम्ही न पुढे ही नसू कधीं॥१२॥
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प्रभु अब जीव सृष्टी की नश्वरता के सत्य की परतें खोल रहें है। यह सत्य सारे समय हमारी आँखों के समक्ष होता है, किंतु हम उसे देख नहीं पातें है। क्योंकि हम उसे देखना नहीं चाहतें है !

श्री भगवान अर्जुन को बता रहें हैं कि ऐसा कोई समय नहीं था जब मैं इस सृष्टी में नहीं था अथवा तुम नहीं थे अथवा यह सारे राजालोग नहीं थे। उन्होंने कहा कि आगे भी ऐसा कोई समय 
नहीं होगा जब मैं या तुम या इन राजालोगों का अस्तित्व नहीं होगा।

कैसे संभव है ?
जीवन का प्रारंभ हम जन्म से मानते हैं जिसका अंत मृत्यु होता है। और मृत्युपश्चात शरीर को अग्निसात किया जाता है। 
ऐसे में जन्म से पहले हमारा अस्तित्व कैसे हो सकते है ?
और मृत्यु के पश्चात किसी का भी भविष्यकाल में अस्तित्व कैसे हो सकता है ?

हिंदु धर्म का सबसे गूढ और देखा जाएं तो सबसे सरल ज्ञानकोश यहीं है, आत्मा का चिरंतन अस्तित्व! अर्थात जीव के अस्तित्व का आरंभ जन्म नहीं है और मृत्यु उसके अस्तित्व का अंत नहीं है !
अस्तित्व तो आत्मा का है और वह अखंड चलनेवाली यात्रा है तबतक जब जीव अपनी आत्मिक उन्नती के मार्ग से मोक्ष प्राप्त ना कर लें !
अर्थात जिसे हम जन्म कहतें है वह आत्मा ने धारण किया हुआ एक देह मात्र है और जिसे मृत्यु कहा जाता है वह आत्मा द्वारा किया गया उस देह का त्याग केवल है। आत्मा पुनः दूसरा देह धारण करेगी और अपने कर्मफल के अनुसार जीवन बिताने पर देह त्याग देगी ।
आत्मा की यात्रा निरंतर चलती रहती है जिसमें विविध शरीरों के पडाव (temporary stops) आतें है किंतु ऐसे पडाव जीवन के अंतिम सत्य अथवा यात्रा का अंतिम स्थान नहीं होता है। आत्मा जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं करतीं है तब तक ऐस पडाव आते जाते रहेंगे।
नदी में विविध स्थानों पर घाट होतें है वैसेही जीव का जन्म नदी पर बांधे गए घाट के समान है। यात्री किसी भी घाट पर थोडा समय बिताकर आगे की यात्रा प्रारंभ करता है। वह एक ही घाट पर निवास नहीं करता है। उसी प्रकार विशिष्ट समय एक देह में बिताने के पश्चात आत्मा उस देह को त्याग कर अपनी यात्रा के अगले पडाव की ओर प्रस्थान करती है।
 
इसलिए प्रभु अर्जुन से कह रहें है कि जो सारे लोग तुम यहाँ देख रहें हो उनके इस समय के देह को ही तुम उनका अस्तित्व मान रहें हो यह तुम्हारी भूल है। किसी और देह में, किसी और रूप में उनका अस्तित्व पहले भी था और अब यदि तुम्हारे (या किसी के भी) शस्त्र के आघात से उनकी मृत्यु हो जाएगी तब भी उनके अस्तित्व का अंत नहीं होगा, वह किसी और रूप में, दूसरे देह में पुन: जिवित रहेंगे !

इसलिए श्री भगवान अर्जुन से कह रहें है कि 'तुम जो दूसरों की मृत्यु का कारण बनने को पाप मानकर उससे बचना चाहते हो यह तुम्हारे ज्ञानी होने का प्रमाण नहीं है। तुम्हारी बुद्धी तुम्हे बरगला (misguide) रहीं है। जन्म और मृत्यु के अटल और अखंड चक्र की अपरिहार्यता को ढंककर तुम्हे मोहवश कर रहीं है !'
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आत्मा की यात्रा और उसमें आनेवाले जन्म और मृत्यु के पडावों के विषय में गीता में जो उपदेश किया गया है उसका सार अत्यंत सुंदरता से सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय नरेंद्र कोहलीजी ने अपने महासमर - खण्ड ७ - पृष्ठ ३०१ पर दिया है।  कोहलीजी की प्रतिभा को नमन कर इस विषय को समझने के लिए यह भाग कृतज्ञतापूर्वक नीचे उद्धृत कर रहीं हूँ - 

"जो मरता है वह शरीर है। हम शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं । आत्मा का न संघटन होता है न विघटन। यह अविकारी है । यह पंचभूतों से संघटित नहीं हुई, इसलिए उसका विघटन भी सम्भव नहीं है। 
हम में से कोई ऐसा नहीं है, जिसका अस्तित्व आत्मा के रूप में किसी काल में नहीं था, अथवा भविष्य में किसी काल में नहीं होगा। और शरीर का क्या है, वह तो ऋतु में आये पुष्प के समान खिलता और मुरझा जाता है। कोई नहीं भी तोड़ता है तो भी मुरझा कर टहनी से गिर जाता है। जिन राजाओं ने युद्ध नहीं किये, क्या उनका देहान्त नहीं हुआ? जिसने जन्म लिया है , उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है और जो मरता है, उसका पुनर्जन्म निश्चित है। देहधारी की मृत्यु उसके अपने शरीर में ही निवास करती है।" 
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क्रमशः
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