हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४४

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । 
सेनयोरुभोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥१०॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )

मग त्यास हृषीकेश जणुं हसत बोलिला।
करीत असतां शोक दोन्ही सैन्यांत तो तसा ॥१०॥
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अपने शस्त्र त्यागकर और युद्ध ना करने का अपना निर्णय बताकर अर्जुन स्तब्ध हो गए थे। दोनों सैन्यों के बीचोबीच इस प्रकार शोकमग्न बैठे हुए अर्जुन से प्रभु ने हँसकर कुछ कहा...

श्रीभगवान द्वारा गीतोपदेश का प्रारंभ यहीं से होता है !

धर्म की रक्षा और पुनर्स्थापना का एकमात्र मार्ग कुरुक्षेत्र में पाण्डवपक्ष का विजय यही है। यदि अर्जुन युद्ध ना करें तो पाण्डवपक्ष के विजय की संभावना नहीं है और अर्जुन ने युद्ध ना करने का निश्चय कर लिया है।
यह स्थिति निर्माण होने की संभावना भगवान श्रीकृष्ण को पहले से रही होगी ऐसा माना जा सकता है। क्योंकि उन्होने युद्ध नहीं किया परंतु वह अर्जुन के सारथि बनकर कुरुक्षेत्र में आएं थे। 
इस प्रकार 'युद्ध ना करने' की उनकी प्रतिज्ञा की रक्षा हुई थी और वह पाण्डवपक्ष के संरक्षक भी बने रहें थे।

परंतु वह अर्जुन के सारथि बनें क्यों थे ?
पाण्डवों को आशीर्वाद देतें और युद्धशिविर में बैठकर उनका मार्गदर्शन करतें ! 
घोडों की वल्गा (लगाम) पकडकर युद्धक्षेत्र में स्वयं को तपाने का कारण क्या था ?

वस्तुतः प्रभु ने अर्जुन के रथ के घोडों की वल्गा नहीं थामी थी, अर्जुन के मन की वल्गा थाम ली थी।

मनुष्य का मन बडा ही वेगवान धावक होता है। और यदि गलत दिशा पकड लें तो, इसके पहले की कोई उपाय किया जाए, वह मनुष्य को विनाश की खाई तक ले जा सकता है। 
घोडा, चिता यह प्राणी वेगवान धावकों की श्रेणी में आतें है, वायु का वेग सबसे अधिक माना जाता है, विज्ञान ने प्रकाश का वेग तक नाप लिया है, परंतु मनुष्य के मन के दौडने का वेग इन सबसे निःसंशय अधिक है और अंधा है ! 
बाकी सबके लिए फिर भी नियम है, वायु और प्रकाश भौतिकविज्ञान (physics) के नियमों से बद्ध है, प्राणियों के दौडने के लिए शिकार करना अथवा शिकार होने से स्वयं को बचाना यह कारण होता है, एक मनुष्य का मन ही बिना कोई कारण के पूर्णतः उन्मुक्त हो सकता है । 
ना कोई बंधन, ना ही नियम.. 
ना दिशा, ना ही कोई अंकुश ..
इसीलिए मनुष्य के मन को बांधने के लिए पक्की डोर की आवश्यकता होती है।

हमारी संकृति में इसका भी विचार किया गया है जैसे प्रत्येक परिवार के कुलदेवता होते है, गुरुमंत्र लेने की और गुरु के मार्गदर्शन में साधना करने की परंपरा भी हमारे समाज में है। यह मार्ग आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है और उसके लिए गुरु पहले शिष्य के मन का शुद्धीकरण (sanitisation) करतें है। 
अपने जीवन की वल्गा शिष्य द्वारा जब गुरु को दी जाती है तब उसके जीवन की - अर्थात विचार और कृति की - दिशा निर्धारण के लिए गुरु निरंतर मार्गदर्शन करतें रहतें है।

जैसे माता अपने बालक की प्रत्येक भूल को क्षमा करती रहती है और हरप्रकार से उसे उसके कल्याण के मार्ग की ओर मोड देती है वैसे ही शिष्य यदि गलती पर गलती करता रहें तब भी गुरु उसका त्याग नहीं करते है, वह उसके हित के लिए उपदेश करते रहते है और आवश्यकता होते पर स्वयं उसके जीवन की दिशा बदल देते है !

अर्जुन ने सदैव श्रीकृष्ण को गुरु माना है। अभी अभी उन्होने कृष्ण से कहा भी था कि 'मैं शिष्य बनकर आपके चरणों में आ गया हूँ, मेरा कल्याण किजिए'।
परंतु अब वह गुरु से मार्गदर्शन की याचना नहीं कर रहें है, उन्होने तो गुरु को अपना निर्णय बता दिया है।
गुरु अपने शिष्य की मनोदशा पूर्ण रूप से जानतें थे। युद्ध का निर्णय होते ही प्रभु समझ गएं होंगे कि ऐसा समय आएगा। इसलिए युद्धशिविर में गुरु के उच्चासन पर बैठने का पर्याय उन्होंने सोचा भी नहीं!
उन्होंने पहले ही बता दिया था कि, 'युद्ध नहीं करूंगा अर्थात शस्त्र नहीं उठाउँगा किंतु मैं अर्जुन के रथ का सारथि बनूंगा !'

अर्जुन ही क्यों ?
अन्य चार पाण्डव क्यों नहीं ?
क्योंकि कुरुक्षेत्र पर युद्ध में विजय मुख्यतः अर्जुन पर निर्भर था और इस प्रकार भावुक होकर अर्जुन द्वारा युद्धक्षेत्र छोड देने की संभावना का आभास प्रभु को पहले ही हो गया था।

श्रीकृष्ण ! 
बडा ही कुशल ग्वाला (गोपाल) है यह ! 
गायों के गले में रस्सी नहीं बांधता है यह ग्वाला, किंतु गायों को हांकता उसी दिशा में है जहाँ उन्हे जाना चाहिए !
यहाँ भी प्रभु वहीं कर रहें हैं। उनके गायों के झुंड में से यह एक गाय अपना मार्ग छोडकर भटकने के लिए निकलनेवाली है। यदि वह सचमुच ही भटक जाएं तो उसे बचाने के लिए ग्वाले को उसके पीछे जाना होगा और तब तक भेडिए बाकी सारी गायों का संहार कर देंगे !
परंतु श्रीकृष्ण नाम का यह ग्वाला अपनी गायों की रक्षा करना जानता हैं !
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क्रमशः
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