हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४७

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ।।१३।।
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गीताई (मराठी अनुवाद: आचार्य विनोबा भावे )

या देहीं बाल्य तारुण्य जरा वा लाभते जशी।
तसा लाभे नवा देह न डगे धीर तो तिथे॥१३॥
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भगवान श्रीकृष्ण पुनःपुनः जीवात्मा की निरंतरता (continuity) और शरीर की नश्वरता को समझा रहें है ।
उन्होने अर्जुन से कहा, "जैसे शरीर के लिए बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था यह स्वाभाविक है अर्थात शरीर को एक के बाद एक इन सारी अवस्थाओं को पार करनअपरिहार्य होता है, उसी प्रकार आत्मा के लिए भी एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर का स्वीकार करना, उसे त्यागकर पुनः नए शरीर को अपनाना यह अपरिहार्य है। इसलिए (किसी भी) शरीर के नष्ट होने पर शोक नहीं करना चाहिए।"

वस्तुतः मनुष्य की दृष्टी संकुचित होती है। हम जो स्वयं देख पातें है उसी को हम सत्य मानते है और जहाँ हमारी दृष्टी की पँहुच ना हो उसे हम असत्य अथवा काल्पनिक समझतें है।

परंतु क्या यह योग्य है ?
हम रूपक के माध्यम से इसपर विचार कर सकतें हैं। 
गहरे सागर में गोता लगानेवाले गोताखोर सागर के तल में जो दृश्य देखतें हैं वह धरतीपर ही रहनेवाले मनुष्य नहीं देख पातें है।  
परंतु धरती पर रहनेवाले व्यक्ति की दृष्टी संकुचित है इस कारण से सागर तल के जीवन की विविधता का सत्य असत्य नहीं बन जाता हैं।
अथवा छोटा बालक जिसकी लंबाई अभी बढीं नहीं है उसे उँचाईपर रखी वस्तु दिखाई नहीं देती है। परंतु उसके माता पिता जो संभवतः पाँच - छः फीट उँचे है उन्हे वह वस्तु दिखाई देती है। अर्थात बालक के दृष्टी की क्षमता उसके छोटे कद के कारण मर्यादित है इसलिए उस वस्तु के अस्तित्व का सत्य असत्य नहीं बन जाता हैं।

इसी प्रकार सामान्य मनुष्य आत्मा के अस्तित्व की निरंतरता को नहीं देख पातें हैं क्योंकि हमारी दृष्टी पंचमहाभूतों से निर्मित स्थूल सृष्टी तक ही मर्यादित हैं। प्रत्येक वस्तु जिसका भौतिक अस्तित्व है उस में पंचमहाभूतों के तत्व विराजमान है। परंतु सृष्टी में कुछ ऐसा भी है जिसका अस्तित्व है किंतु उसे देखा नहीं जा सकता है, उसे स्पर्श नहीं किया जा सकता है, उसके अस्तित्व के लिए भौतिक स्थान (physical space in square feet /meter etc.) की आवश्यकता नहीं होती है, परंतु फिर भी उसका अस्तित्व होता है। इसे सूक्ष्म सृष्टी में अस्तित्व कहा जाता है ।
उदाहरण के लिए प्रेम - आदर - अपनत्व - क्रोध - ईर्ष्या - घृणा - तिरस्कार आदि भावनाओं के अस्तित्व को हम अनुभव से समझतें है परंतु इन सबका भौतिक अस्तित्व नहीं होता है। यह सूक्ष्म सृष्टी का भाग है।
परंतु यह सूक्ष्म सृष्टी का बस एक छोटा भाग है। जो सृष्टी हमारी दृष्टी सें परे है और असीम, अमर्यादित, अनंत है (borderless, infinite, endless) है, उस सृष्टी का ज्ञान जिसे है वहीं आत्मा की अखण्ड चलनेवाली यात्रा को समझ पाएंगे।

और क्योंकि सामान्य मनुष्य केवल भौतिक सृष्टी को देख पातें है, इसलिए उन्हे आत्मिक उन्नति के लिए मार्गदर्शन करने के लिए सनातन संस्कृति में गुरुपरंपरा का महत्वपूर्ण स्थान है !
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क्रमशः
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