हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४२
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८॥
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गीताई (मराठी अनुवाद: आचार्य विनोबा भावे)
मिळेल निष्कंटक राज्य येथें
लाभेल इंद्रासन देवलोकी।
शमेल त्यानें न तथापि शोक
जो इंद्रियांतें सुकवीत माझ्या ॥८॥
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गहरे सागर के मध्य में भयंकर तुफान में फंसी हुई नौका समान स्थिति अब अर्जुन की है !
पानी पर हिचकोले खाती हुई नाव एक क्षण लहरों के उपर उछलती है और दूसरे क्षण जैसे सागर की गहराई में डूबने के लिए अंधी छलांग लगाती है वैसे ही अर्जुन की स्थिति है।
अभी अभी वह अपनी भूल का आभास पाकर श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन की याचना कर रहें थे। लग रहा था जैसे प्रभु उन्हे उनके विचारों के खोखलेपन का बोध कराएंगे तो वह अपने संपूर्ण चैतन्य सहित युद्ध के लिए दक्ष हो जाएंगे ।
परंतु कहाँ !
फिरसे अर्जुन अपने शस्त्र त्यागने के लिए प्रस्तुत है ! अत्यंत निराशा से वह कह रहें है कि 'इस युद्ध में विजय होने पर हमारी राज्यप्राप्ती की सारी बाधाएँ दूर होंगी, धनधान्य से समृद्ध भूमि प्राप्त होगी और हम देवताओं के सिंहासन समान अधिकार प्राप्त करेंगे यह देखनेपर भी मेरा मन शोकग्रस्त है। जैरे मेरी सारी इन्द्रियों की चेतना निचोडकर मुझे शक्तिहीन करनेवाली परिस्थिति निर्माण हुई है'।
स्पष्ट है कि पुनः अर्जुन के मन ने विवेक का साथ छोड दिया है। अभी अभी प्रभु से कह रहे थे की 'मार्गदर्शन किजिए' और अब ऐसे निश्चयपूर्वक कह रहे है कि 'धन और यश प्राप्ती का इतना लुभावना दृश्य इस युद्धक्षेत्र के पार मैं देख रहां हूँ , किंतु मुझे नहीं चाहिए वह सब !
अपनों को खोने के भय से अर्जुन भावुक हो गएं है। वह कह रहें है कि समृद्धी का यह स्वप्न भी मुझे आकर्षित नहीं कर रहा है । क्या करूं मैं इस लेकर जब उसे प्राप्त करने पर भी मेरे देह के सारे इंद्रिय सूखी लकडी के समान सुख भोगने में अक्षम हो जाएंगे ?'
ऐसी स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है। एक और सत्य और न्याय है और दूसरी ओर सगेसंबंधी !
हम सोचतें है कि कितना अच्छा होगा यदि हमारे लोग भी सत्य और न्याय का मार्ग अपनाएं और हमारे साथ खडें हो जाएं। तब हम उनका साहचर्य भी पा सकेंगे और प्रसन्नतापूर्वक जीवन के सुखों का उपभोग कर पाएंगे (will be able to enjoy pleasures of life in company of friends & family)।
परंतु ऐसे होता नहीं है। क्योंकि जिन्हे हम अपना मानतें है वह विरुद्ध पक्ष में खडे दिखाई देतें है। अब हम इसे मानना चाहें या ना चाहें किंतु सत्य यही होता है कि हम जिन्हें अपना मानते हैं वह हमें उतना अपना नहीं मानतें है ! उनकी अपनी प्राथमिकताएँ (priorities) होतीं है और उन्हे त्यागकर हमारे लिए पक्ष बदलने का वह सोचते भी नहीं है।
उनका यह विद्रुप सत्य हम देख नहीं पातें हैं क्योंकि हमें उस सत्य को देखने की इच्छा नहीं होती है।
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क्रमशः
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