हिंदु धर्मसंस्कार 🚩: भाग २४५
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥११॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )
श्रीभगवान म्हणाले
करिंसी भलता शोक वरी ज्ञानही सांगसी।
मेल्याजित्याविषीं खंत ज्ञानवंत न जाणितीं॥११॥
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श्रीभगवान ने (अर्जुन से) कहा, "जो शोक करने योग्य नहीं हैं उनके लिए तुम शोक कर रहे हो। और तुम सोच रहें हो कि यही ज्ञान है। वस्तुतः जो जिवित है और जो मृत्यु को प्राप्त हो गए है उन दोनो के लिए ज्ञानी जन शोक नहीं करते है !"
श्रीभगवान द्वारा गीता के उपदेश प्रारंभ हो रहा है। और आरंभ में ही उन्होने अर्जुन को डाँट दिया है।
अर्जुन को ऐसे तीखे शब्दों में डाँटने के लिए छोटा बालक नहीं है वह !
समर्थ - योग्य - पराक्रमी प्रौढ पुरुष है, चार पुत्रों के पिता है, उन्हीं के पराक्रम पर विश्वास कर युधिष्ठिर ने युद्ध का निर्णय लिया था। और श्रीकृष्ण भी उनके वीरता पर विश्वास करतें है, धर्मरक्षा के लिए युद्ध में अर्जुन का महत्व जानतें है। इसिलिए वह अर्जुन के सारथि बनकर कुरुक्षेत्र में आएं है।
फिर ऐसी डाँट क्यों ?
वस्तुतः श्रीकृष्ण ने अर्जुन को तीखें शब्दों में डाँटने का यह एकमेव प्रसंग नहीं है। अर्जुन श्रेष्ठ और योग्य है किंतु मनुष्य है और श्रीकृष्ण साक्षात ईश्वर है !उनकी भविष्यवेधी दृष्टी की कोई सीमा नहीं है। इसलिए प्रभु ने जब भी देखा की अर्जुन की कृति धर्मरक्षा के व्यापक हित को छेद दे रहीं हैं, तब अर्जुन को डाँट पडीं है !
जैसे, युद्ध के तेरहवें दिन अभिमन्यु की मृत्यु चक्रव्यूह में हुई थी। अभिमन्यु चक्रव्यूह का भेद करना जानतें थे किंतु चक्रव्यूह से सुरक्षित बाहर आने की उनकी शिक्षा पूर्ण नहीं हुई थी।
युद्ध के तेरहवें दिन तक पाण्डवपक्ष के एक भी प्रमुख योध्दा की मृत्यु नहीं हो पायी थी परंतु कौरवपक्ष के योद्धाओं का वध हो रहा था।
पितामह भीष्म बाणों से जर्जर होकर युद्धक्षेत्र से हट गए थे, दुर्योधन के अनेक भ्राताओं की मृत्यु हो गई थी, प्रागज्योतिषपुर का राजा भगदत्त मारा जा चुका था।
दुर्योधन के क्रोध की सीमा नहीं थी। पाण्डवपक्ष की हानि ना कर पाने के लिए उसने सेनापती द्रोणाचार्य से उसने कटू शब्द कहें !
अब द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की। पाण्डवों के सेना में केवल दो महारथी थे जो चक्रव्यूह का भेद कर सकते थें और शत्रु की पूर्ण हानि कर उसमें से सुरक्षित बाहर भी निकल सकते थे, श्रीकृष्ण और अर्जुन। चक्रव्यूह भेदना जितना कठिन था, उससे बाहर निकलना भी उतना ही कठिन था। कपटी दुर्योधन ने त्रिगर्त देश के राजा सुशर्मा, उसके भ्राता और सेनानी और त्रिगर्तों की पूर्ण सेना से युद्ध के लिए अर्जुन को उलझाकर उसे मुख्य रणक्षेत्र से दूर कहीं हटाने की नीति अपनाई।
यह युद्ध के दांवपेच नहीं थे, उसके मन में पाप था क्योंकि अकेले अभिमन्यू के साथ व्यूह के अंदर जो भी हुआ वह न्याय नहीं था ! द्रोणाचार्य , कर्ण, दुर्योधन, कृपाचार्य , अश्वत्थामा और कृतवर्मा (यह श्रीकृष्ण का समधी था। श्रीकृष्ण - सत्यभामा की पुत्री चारुमति का विवाह इसके पुत्र से हुआ था) इनके सहित अनेक योध्दा अकेले अभिमन्यू पर टूट पडे और उन्होने एकसाथ आक्रमण कर उसे मार दिया। धर्मयुद्ध और नैतिकता के सारे नियम तोडकर छः महारथीयों ने सोलह वर्ष के उस वीर बालक पर धावा बोलकर उसे निहत्था (निःशस्त्र) कर मार दिया था। उसकी मृत्यु का श्रेय लेकर जयद्रथ अपने पराक्रम की गाथा प्रचारित कर रहा था। क्योंकि चक्रव्यूह के प्रवेशद्वार पर वह नियुक्त था और व्यूह में अभिमन्यु के प्रवेश के पश्चात किसी एक भी योद्धा को अंदर प्रवेश ना करने देने की व्यूह की निति उसने सफल की थी !
अभिमन्यु के मृत्यु की वार्ता सुनकर अर्जुन शोकग्रस्त हुए थे। जब उन्होंने जयद्रथ के बडबोलेपन (tomtoming)का समाचार सुना तो अर्जुन अति क्रोधित हो गएं और उन्होने प्रतिज्ञा ली कि, 'कल सूर्यास्त से पूर्व मैं जयद्रथ का वध करूंगा। यदि यह नहीं कर पाया तो मैं चितारोहण कर मृत्यु को प्राप्त हो जाऊंगा'।
अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनते ही श्रीकृष्ण अति चिंतित हो गए थे। उन्होने अर्जुन को डाँटा था। उन्होंने कहा, 'यह क्या किया है तुमने ? अपनी युद्धनीति कौन ऐसे शत्रु के समक्ष उद्घाटित करता है ? इससे तो वह सावधान हो जाएंगे ! और यह प्रतिज्ञा किससे पूछकर ली है तुमने ? कौरवों का काम अब कितना सरल हो गया है ! उनका मुख्य उद्देश तुम्हारी मृत्यु है, और इसके लिए अब उन्हे केवल एक ही काम करना है, कल के संपूर्ण दिन कौरवों की सेना केवल जयद्रथ की सुरक्षा करेगी और इससे तुम्हारी मृत्यु निश्चित हो जाएगी। ऐसी प्रतिज्ञा कर उसे प्रचारित करने से अधिक मूर्खतापूर्ण कार्य कोई हो ही नहीं सकता।"
अर्जुन की इस प्रतिज्ञा से प्रभु सचमुच चिंतित थे। आनेवाले संकट का आभास उन्हे हो गया था। इसलिए साधारणतया शांत रहनेवाले प्रभु ने भी अत्यंत तीखे शब्दों में अर्जुन की आलोचना और निर्भत्सना की थी !
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अपनी शोकमग्न स्थिति में भी अर्जुन ने प्रतिवाद नहीं किया था। कच्ची आयु के अपने वीर पुत्र की मृत्यु के शोक में ग्रस्त होने पर भी अर्जुन का विवेक इतना जागृत था की श्रीकृष्ण की डाँट का कारण उनकी अपनी भूल थी यह समझकर उन्होने चुपचाप सबकुछ सुन लिया था।
दोनो का संबंध कितना कोमल, कितना मनोज्ञ है !
भगवान श्रीविष्णु मानवी रूप में विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर को डाँट रहें है और वह अत्यंत लीनता से चुपचाप सुन रहें हैं !
जहाँ प्रभु का उपदेश मनुष्यों के आचरण के लिए आदर्श हैं, वहीं अर्जुन की विनम्रता और गुरु के प्रति समर्पण का भाव भी हम सामान्य मनुष्यों के लिए आदर्श है।
गुरु से प्रश्न पूछें जा सकतें है, अपनी शंकाएँ उनके सम्मुख रखी जा सकती है परंतु उनके निर्णय की अवहेलना अथवा उल्लंघन नहीं करना चाहिए यह महाभारत के अनेक प्रसंगों में स्थापित किया गया है।
श्री भगवान ने आगे कहा है कि जिनकी मृत्यु हो गई है और जो जिवित है (अर्थात जिनकी मृत्यु अभी हुई नहीं है ) उनके लिए ज्ञानी जन शोक नहीं करतें है।
यह केवल कुछ शब्द नहीं है, मानवी जीवन की क्षणभंगुरता का सार है !
मृत्यु यह जीवसृष्टी का अपरिवर्तनीय सत्य है इस बोध के कारण ज्ञानी व्यक्ति किसी की भी मृत्यु का शोक नहीं करतें है, उसे स्वीकार करतें है। उसी प्रकार जिवित व्यक्ति की मृत्यु का भविष्य देखकर भी शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि वह मनुष्य अपने कर्मफल के अनुसार मृत्यु प्राप्त करतें है। प्रत्येक जीवित प्राणी को मृत्यु के मार्ग से जाना ही होगा यही अंतिम विधान है यह जानकर हमें जन्म के साथ जुडे मृत्यु के चक्र को स्थिर बुद्धी से स्वीकार करना चाहिए !
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क्रमशः
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