हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २४९

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । 
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥१५॥
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गीताई :
(मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )

ह्यांचि मात्रा न चालेचि ज्या धीर पुरुषावरी।
सम देखे सुखे - दुःखे मोक्षलाभास योग्य तो ॥१५॥
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श्रीकृष्ण बता रहें हैं कि इन्द्रियों के साथ विषय (इच्छा) का संयोग होने पर मिलनेवाले सुख और दुख से जिसका मन आंदोलित नहीं होता है ऐसा योग्य पुरुष ही मोक्ष पाने का अधिकारी होता है। (यहाँ पुरुष इस शब्द को मनुष्य इस अर्थ से देखना चाहिए। जो श्रीकृष्ण स्त्री की मर्यादा की रक्षा के लिए जीवनभर बद्ध रहें, जिनके जीवन में माता, पत्नी के रूप में धैर्यवान स्त्रियाँ थी, जिन्होने अपनी कुन्तीबुआ का उनके धैर्य - त्याग - वैराग्य - निश्चय जैसे गुणों के कारण सदैव सम्मान किया है, जो श्रीकृष्ण द्रौपदी को सखी के रूप में देखते थे , जिन्होने अपनी भगिनी सुभद्रा के युद्धकला प्रशिक्षण को महत्वपूर्ण माना था, उनके मन में स्त्री पुरुष के लिए समतल स्थान होना ही तर्कसंगत है ! यहाँ पुरुष शब्द का प्रयोग कदाचित इसलिए किया गया है क्योंकि यह उपदेश युद्धभूमि में अर्जुन को किया जा रहा है। इस निर्णायक युद्ध के प्रारंभ से पूर्व ही हताशा से अपने शस्त्र त्याग चुके अर्जुन की चेतना लौटाकर उन्हे पुनः युद्धसज्ज करने का दायित्व प्रभु पर आ पडा है। ऐसे में अर्जुन का रजोगुण [= इस संदर्भ में अर्थ क्षत्रियवृत्ति ] जगाने के लिए प्रभु उनके समक्ष 'श्रेष्ठ पुरुषों' के गुणों की चर्चा कर रहे है। )

सनातन हिंदु धर्म के अनुसार किसी भी जीव का अंतिम लक्ष्य मोक्षप्राप्ती होना चाहिए। मोक्षप्राप्ती के लिए मन को ईश्वरोन्मुख (literally : facing God)  करना पडता है। ईश्वर का सर्वव्यापित्व और स्वयं के लघुत्व का बोध होना आवश्यक होता है (consciousness about  tiny / miniscule existence of self vs the supreme power & infinite existence of God)। और यह तभी संभव होगा जब मन को विचलित करनेवाली भावनाओं के उतारचढावों से मन मुक्त रहेगा।

मन की ऐसी सहज अवस्था तभी संभव होगी जब सुख और दुख के झोंके मन को आंदोलित ना करें !

परंतु क्या यह संभव है ?
मनुष्य का जन्म लेनेपर बाल्यावस्था - युवावस्था - वृद्धावस्था यह यात्रा अपरिहार्य है , प्रत्येक अवस्था में कुछ तो आनंद है और कुछ चुनौतियाँ होती है , यश - अपयश मिलेगा , गृहस्थ जीवन में कुछ लोग साथ देंगे और कुछ संकट खडे करेंगे, मनुष्य का देह है तो रोग भी हो सकते है, नैसर्गिक आपत्तियाँ , राजकीय स्थिति में बदलाव, आकस्मिक संकट अथवा अपघात ... क्या नहीं हो सकता है ! और ऐसी परिस्थितियों में सामान्य मनुष्य का मन डोलता हैं, आतंकित होता है।

प्रभु कह रहें है कि देह धारण किया है तो इस संसार के नियम मानकर चलना होगा किंतु यह आवश्यक नहीं है कि देह के अनुभवों को हम अपने पैरों की श्रृंखला बना लें। जैसे कमल का पत्ता अपनी पूर्ण आयु पानी के अंदर ही व्यतीत करता है , कमलपुष्प को खिलकर पानी के बहाव में भी सीधे खडे रहनें के लिए आधार बनता है परंतु स्वयं निर्लेप होता है , उसपर एक बूंद पानी तक नही रुक सकता है , मनुष्य को अपने जीवन के सुख और दुःख को ऐसे ही स्वीकारना चाहिए !

रहना है इसी संसार में ..
अनेक दायित्व पूर्ण करने है ...
गृहस्थी बसा कर  वंशवृद्धी करना है... 
गृहस्थी चलाने के लिए कमाना है..
समाज में रहना है इसलिए सामाजिक कर्तव्य निभाने है , इच्छा से अथवा अनिच्छा से , किंतु निभाने होंगे ...
अर्थात विविध भूमिकाओं में विविध कर्म करने होंगे। परंतु उसी में मन लगाकर उसे ही जीवन का सार मानना, उसे ही अपना साध्य / लक्ष्य मानना यह करने से सुख के प्रति आसक्ति बढती है और प्रतिकूल परिस्थिति में दुख की अनुभूती की तीव्रता भी बढ़ती है।

जैसे हम हाट (market) से कोई वस्तू क्रय करते है तो उस वस्तु को कागज के पैकेट में / थैली में दिया जाता है। हम उस पैकेट / थैली को संभलकर घर लातें है क्योंकि हमें वस्तु सुरक्षित रखनी होती है, किसी भी प्रकार से वस्तु की हानि नहीं होने दे सकते है। किंतु घर आनेपर उस पैकेट / थैली से वस्तु निकाल लेतें है । क्योंकि हमारा लक्ष्य वस्तु है , थैली नहीं !
ठीक इसी प्रकार मनुष्य जीवन की सार्थकता शरीर नामक पैकेट / थैली में अल्पकाल के लिए निवास करनेवाली आत्मा की रक्षा करना है। केवल इन्द्रिय सुख पाने के लिए तत्वों को मरोडने से आत्मा का अधःपतन होता है । इसलिए योग्य मनुष्य वह है जो देह के सुख और दुख को अथवा वर्तमान देह में स्थित मन को सुख अथवा दुख देनेवाली स्थिति को भी समत्व बुद्धी से देखता है। जो मनुष्य सुख के बहाव में बह नहीं जाता है और दुख से विचलित नहीं होता है ऐसा मनुष्य ही मोक्ष प्राप्त कर सकता है !

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क्रमशः
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