हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५९
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥३१॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
स्वधर्म तो हि पाहूनि न योग्य डगणे तुज ।
धर्म - युद्धाहुनी कांही क्षत्रियास नसे भले ॥३१॥
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श्रीभगवान् अर्जुन को उनके धर्म का स्मरण करा रहें है। वह कह रहें है कि मार्ग में कठिनाइयाँ हो अथवा संकट परंतु अर्जुन को 'स्वधर्म' का पालन करना चाहिए। धर्मपालन का समय आनेपर मुख मोड लेना समर्थनीय नहीं हो सकता है।
इसी अध्याय के श्लोक १८ के संदर्भ में हमने सनातन हिंदु धर्म के अनुसार 'धर्म' इस संकल्पना पर विचार किया था जिसमें हमने यह चर्चा की थी कि सनातनी हिंदु धर्म केवल धार्मिक कर्म अर्थात जाप, पूजा-अनुष्ठान, होम-हवन, तीर्थयात्रा-गंगास्नान, यज्ञ, स्तोत्रपठन-आवर्तन, व्रत-साधना, इन्हीं को धर्म नहीं मानते है। यह सब धर्मकृत्य ही है किंतु धर्म की व्याख्या अत्यंत गहन और विशाल है। धार्मिक कार्यक्रम यह धर्म का एक प्रमुख किंतु छोटा भाग है।
सनातन हिंदु परंपरा में कर्तव्यपालन को श्रेष्ठ धर्म कहा गया है और प्रत्येक भूमिका में कर्तव्यपूर्ति आवश्यक बताई गई है। जैसे गृहस्थाश्रमी मनुष्य और संन्यासी के कर्तव्य पृथक है। वह गृहस्थाश्रमी व्यक्ति यदि व्यावसायिक है (businessman) है तो उसके कार्य के संदर्भ में उसका कुछ कर्तव्य है और यदि वह किसी के अधीन काम कर रहा है (service - Govt / private sector) तो वहाँ उसका कर्तव्य पृथक (different) होगा।
खिलाडियों का कुछ कर्तव्य होगा, समाजसेवकों के लिए भी होगा, समाज के घटक के रूप में भी प्रत्येक मनुष्य के कुछ कर्तव्य होंगे।
उदाहरण के लिए राजा (सत्ताधारी) का धर्म और प्रजा का धर्म पृथक है।
जैसे, प्रजाजनों के घर चोरी होने पर उनका धर्म चोर को दण्डित करना नहीं है। उन्होंने चोर को पकड लिया हो तब भी उसे सुरक्षाकर्मियों को सौंपना यह उनका धर्म है। प्रजा को न्यायदान का अधिकार नहीं है इसलिए दण्ड देने का भी अधिकार नहीं है। क्योंकि प्रजा का प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार स्वयं न्यायाधीश बन जाए तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
उधर राजा का धर्म चोरी की घटना कि जानकारी लेकर चोर को पकड़ना और को दण्ड देना है। इसके लिए सुरक्षाकर्मियों की नियुक्ति करना, उन्हे प्रशिक्षण देना, कार्य के लिए आवश्यक यंत्रणा निर्माण करना और सुरक्षाकर्मियों को सेवा के लिए लाभ (service benefits) प्रदान करना यह राजकर्तव्य का भाग है।
तात्पर्य, हम हिंदु 'One size fits all' ऐसा नहीं देखतें है बल्कि कर्तव्य की व्याख्या लचीली है। हिंदु धर्म मनुष्य को अपनी भूमिका के दायरे में कर्तव्यपालन के स्वतंत्रता देता है, परंतु कर्तव्यपालन अत्यावश्यक (non-negotiable) है और इसे 'धर्मपालन' कहा गया है !
क्योंकि कर्तव्य का पालन ना करने पर वह मनुष्य धर्मच्युत कहलाता है और कर्तव्य के विरुद्ध व्यवहार करने पर अधर्मी कहलता है।
अर्जुन क्षत्रिय है।
और क्षत्रिय का धर्म है न्याय की रक्षा !
झसलिए प्रभु अर्जुन से कह रहें है कि सामने शत्रु के रूप में दुर्योधन की सेना है। दुर्योधन उन्मत्त सत्ताधारी है, उसे सत्ता की आकांक्षा केवल स्वार्थ के लिए है, सत्ता और सम्पत्ति का उपयोग प्रजाहित और लोककल्याण के लिए करने की उसकी पद्धति नहीं है, वह केवल विविध भौतिक सुख प्राप्त करने के लिए सत्ता - सम्पत्ति चाहता है।
जिसका भाव ही स्वार्थ से लिप्त हो वह सत्ता और सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए अनैतिक मार्ग भी अपना सकता है, दूसरों को वंचित कर अपना कोश भर सकता है।
ऐसे व्यक्ति को दण्ड देकर / युद्ध में पराजित कर न्याय की पुनर्स्थापना करना, प्रजा को कल्याणकारी राज्य (welfare state) का लाभ देना यह क्षत्रिय का धर्म है ।
प्रभु अर्जुन को समझा भी रहें है और हल्का सा उपालंभ (reproach) भी दे रहें है।
वह अर्जुन से कह रहें है कि 'तुम जानते हो की तुम्हारा धर्म क्या है। फिर भी अत्याचारी, अन्यायी, अधर्मी शत्रु को युध्दक्षेत्र में सम्मुख देखकर तुम्हे उस पक्ष के योध्दाओं के प्रति प्रेम उमड आ रहा है यह अनुचित है। अधर्मी का साथ देनेवाला व्यक्ति स्वयं अधर्मी ना होने पर भी अपराधी हैं क्योंकि वह अन्याय - अत्याचार - विध्वंस के पक्ष को अधिक शक्तिशाली बना रहा हैं, इसलिए उनके प्रति अपनी वैयक्तिक प्रेमभावना और संबंधों का विचार परे रखकर शस्त्र उठाना ही तुम्हारा धर्म है। उनके लोभ में युद्ध ना करने का निर्णय स्वधर्म से मुख मोडना कहलाएगा !'
इस प्रकार एक कडवा सच हल्के से अर्जुन के सामने रखकर प्रभु ने उन्हे उनके काल्पनिक आदर्श संसार का वास्तविक मैला दर्पण दिखा दिया और उनसे कहा की 'जागो, धर्म के लिए युद्ध करना क्षत्रियों का धर्म है यह जानकर युध्दसज्ज हो जाओ!'
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क्रमशः
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