हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५०
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
-----------------------------------------------------------
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६॥
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ।।१७।।
-----------------------------------------------------------
गीताई :
(मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
नसे मिथ्यास अस्तित्व नसे सत्यास नाश ही।
निवाडा देखिला अंती या दोहींचा अशापरी ॥१६॥
ज्याने हे व्यापिले सारे ते जाण अविनाश तू ।
नाश त्या नित्य तत्वाचा कोणी ही न करू शके
॥१७॥
-----------------------------------------------------------
युद्ध में अपने संबंधियों की मृत्यु हो सकती है इस विचार से अर्जुन का मन विव्हल हो गया है। और स्वयं उनकी मृत्यु का कारण बनने की संभावना उन्हे अत्यंत व्याकुल कर रहीं है।
इसलिए अर्जुन के मन में जैसे वैराग्य का भाव उपजा है। उन्होने श्रीकृष्ण से कहा भी कि इतने बडे विनाश का कारण बनने से अच्छा तो यहीं होगा कि हम पुनः वनवास ही कर लें। फिर जिन्हे राज्य करना है करतें रहें।
इस संभावित जिवितहानी के लिए स्वयं को दोषी मानकर अर्जुन शोक कर रहें है। इसलिए भगवान उन्हे समझाते हुए बता रहें है कि नाश - विनाश इन कल्पनाओं का सत्य स्वरूप समझना चाहिए।
उन्होने कहा कि 'विश्व में जो सत् तत्व है उसका नाश संभव नहीं है। उसका विनाश नहीं हो सकता।'
सामान्य भाषा में सत् को सकारात्मक तत्व कहा जा सकता है। सत्य, न्याय, धर्म इस सत् तत्व के ही भिन्न भिन्न पहलु है अथवा विभिन्न रूप है। और क्योंकि सत् तत्व विनाशरहित है इसलिए किसी सद्गुणी व्यक्ति की मृत्यु होने पर भी वह नष्ट नहीं हो पाता है। सत् तत्व के निवास, रक्षा और वृद्धी के लिए विश्व में साधन (= जीव / मनुष्य) एक के बाद एक जुटते रहेंगे क्योंकि मनुष्य का देह नश्वर है किंतु सत् तत्व का अस्तित्व अमर है।'
इसलिए प्रभु अर्जुन को समझा रहें है कि 'तुम्हारे कारण मनुष्यों की मृत्यु होगी और उन मनुष्यों में वास करनेवाले गुण और पावित्र्य भी नष्ट हो जाएंगे ' इस भय को त्याग दो। क्योंकि सत् तत्व किसी भी देह का आश्रित नहीं है। हम अच्छाई को एक व्यक्ति में देखतें है इसलिए वह देह अच्छाई की मर्यादा नहीं है, देह नष्ट होने पर भी अच्छाई का तत्व सृष्टी में कायम रहेगा। क्योंकि सत् तत्व का विनाश करने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं है।'
यद्यपि संपूर्ण गीतोपदेश में ही मनुष्य के मन में उभरते रहनेवाले प्रश्नों के उत्तर है, किंतु हम सामान्य मनुष्यों के लिए दूसरा अध्याय हमारे जीवन की नींव बनने जितना महत्वपूर्ण है।
इसमें देह की नश्वरता (नश्वर = जिसका नाश होगा) की चर्चा है, इस नश्वर देह के मोह में मनुष्य कैसे गलत निर्णय लेता है इसका विश्लेषण है, विश्व के शाश्वत तत्व (= सत्) की अमरता का वर्णन है, विश्व का विनाश करने को उद्यत (ready to destroy /reason for destruction) असत् तत्व का अंत में नाश होने आश्वासन है और मनुष्य अपनी जीवनयात्रा पूर्ण समर्पण भाव से करते हुए भी कैसे स्थितप्रज्ञता से जीवन जीते हुए आत्मोन्नति कर सकता है इसका मौलिक उपदेश है।
-----------------------------------------------------------
क्रमशः
-----------------------------------------------------------
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें