हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५२

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । 
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )

निर्विकार चि हा नित्य जन्म - मृत्यूंहुनि पर।
ज़ाणे हें तत्व तो कैसा मारी वा मारवी कुणा॥२१॥
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शब्दार्थ :

हे पार्थ, जिसे यह ज्ञात हो कि आत्मा अविनाशी, नित्य (शाश्वत ) और जन्म - मृत्यु से मुक्त और है, वह किसी को कैसे मार सकता है अथवा वह किसी की मृत्यु कैसे करवा सकता है?

भावार्थ : 

प्रियजनों की मृत्यु की आशंका से अर्जुन व्याकुल है इसलिए प्रभु उसे 'मृत्यु' का सत्य स्वरूप समझा रहें है।

अर्जुन अभी मोहग्रस्त है इसलिए वह प्रियजनों को सदैव अपने सम्मुख देखने की इच्छा कर रहा है। प्रभु उसे बता रहें है कि जो वह देख रहा है वह वास्तव में देह मात्र है । परंतु उस देह का चैतन्य , उर्जा जो आत्मा है वह दिखाई न देने पर भी उसका अस्तित्व निरंतर बना रहता है ।

आत्मा का विनाश नहीं होता है, उसका अस्तित्व चिरकाल बना रहता है क्योंकी उसका ना तो जन्म होता है ना ही मृत्यु होती है। जैसे हमने थैली में मिट्टी भर दी हो और थैला पूर्णतः फट जाएं तब मिट्टी नीचे गिर जाएगी। वह किसी भी स्थान पर गिर जाएं, जैसे मिट्टी में, रेत में , नदी में अथवा आजकाल वह सिमेंट पर भी गिर सकती है, परंतु मिट्टी नष्ट नहीं होगी । उसका रूप बदल सकता है, जैसे उसका कीचड बनेगा अथवा पानी में घुलकर मैले पानी जैसी दिख सकती है। रेत अथवा सिमेंट पर गिरने से उसके कण बिखर जाएंगे परंतु नष्ट तो वह तब भी नही ही होगी। 

प्रभु बता रहें है कि आत्मा भी ऐसी ही है। वह नष्ट नहीं होती है।

आत्मा के गुणविशेष अर्जुन को बताकर प्रभ उसे बता रहें है कि वह किसी की भी मृत्यु का कारण नहीं बननेवाला है।

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क्रमशः
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