हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५३


जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२२॥
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गीताई :
(मराठी अनुवाद आचार्य विनोबा भावे)
सांडूनिया जर्जर जीर्ण वस्त्रे
मनुष्य घेतो दुसरी नवीन ।
तशीच टाकूनि जुनी शरीरे
आत्मा ही घेतो दुसरी निराळी ॥२२॥
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गीता के कुल ७०० श्लोकों में से कुछ श्लोक अति प्रसिद्ध है। यद्यापि गीता का प्रत्येक श्लोक अत्यंत अर्थपूर्ण है किंतु कुछ श्लोक कदाचित उनके अर्थ की सुलभता के कारण जनमानस को अधिक परिचित है।

आज का श्लोक भी इन सुपरिचित श्लोकों में से है।

श्रीभगवान अर्जुन से कह रहें है कि जिस प्रकार वस्त्र पुराने / जीर्ण होने पर मनुष्य उन्हे त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार देह जीर्ण होने पर आत्मा उसे त्याग देती है (अर्थात मृत्यु) और यथासमय नया देह धारण करती हैं।

देह की नश्वरता का कितना सुलभ विवेचन कर रहें है प्रभु ! इस पर विचार करने से हम मनुष्य की जीवन के प्रति आसक्ति, विविध इच्छाओं का मायाजाल, अन्य मनुष्यों प्रति द्वेष और ईर्ष्या जैसे भाव इन सबकी क्षुद्रता समझ सकेंगे। 

हमारा जीवन जटिल इसलिए होता है कि हम वर्तमान देह से जुडा प्रत्येक व्यवहार, संबंध, परिस्थिति और भावना को सत्य मानकर प्रतिक्रिया देते रहतें है, प्रकट रूप से ना दें पाएं तो मन ही मन प्रतिक्रिया देते है। मन को कष्ट देनेवाली प्रतिक्रियाएँ साधारणतया दुख, निराशा, हताशा अथवा क्रोध से उत्पन्न होती है। और इसका कारण होता है देह के लिए विविध सुख पाने की मनुष्य की इच्छा ! 

अनेक बार इच्छाएँ देह को नहीं अपितु मन को सुख प्राप्त करने की भी होती है। परंतु फिर भी वह सुख वर्तमान जन्म के देह में स्थित मन के सुख से ही जुडा हुआ होता है, उनमें आत्मिक सुख प्राप्त करने का भाव नहीं होता हैं। और जो सुख तात्कालिक स्वरूप का हो उसकी प्राप्ती की इच्छा / वासना अंततः कष्टदायक हो यह स्वाभाविक है।

इसलिए मनुष्य को इस देह की नश्वरता का सदैव स्मरण रखना चाहिए। जो देह ही नष्ट होनेवाला है उससे जुडे सुख को कितना महत्व देना चाहिए यह सोचनेवाली बात है !
जिस देह के नष्ट होने के समय और कारण पर भी हमारा वश नहीं है उस देह से जुडी इच्छा के प्रति कितनी आसक्ती होनी चाहिए इसपर भी हमें विचार करना चाहिए !
साथ ही , उस देह के माध्यम से वर्तमान जन्म में अर्जित / प्राप्त उपलब्धियों के प्रति कितना अहंकार होना चाहिए यह प्रश्न वास्तव में हमारे अनेक प्रश्नों का उत्तर हो सकता है !
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 क्रमशः
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