हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६१

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️  श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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अथ चेत्त्वमिमं धर्म्य स‌ङ्ग्रामं न करिष्यसि । 
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥३३॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
हें धर्म - युद्ध टाळूनी पापांत पडशील तूं । 
स्वधर्मासह कीर्तींस दूर सारूनियां  स्वयें॥३३॥
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हमारे दैनंदिन जीवन में आज भी उपयुक्त हो सकें ऐसा मार्ग प्रभु ने इस श्लोक में बताया है।
वह कह रहे है कि यहाँ एक धर्मयुद्ध का प्रारंभ हो रहा है और किसी भी कारण से तुम यदि इस धर्मयुद्ध से मुख मोड लोगे तो पाप का धनी होना निश्चित है। तुम स्वधर्म का पालन नहीं करोगे तो तुम्हारी किर्ती भी नष्ट हो जाएगी।
हमें समझना होगा कि श्रीमद् भगवद् गीता पढ़ना और उसका अभ्यास करना इसका उद्देश केवल हमारे इतिहास को जानना और द्वापारयुग के उस काल के मनुष्यों के विषय में जानकारी प्राप्त करने जितना मर्यादित नहीं है।

हमारे धर्म में रामायण व महाभारत को इतिहास कहा गया है क्योंकि इनका कालखण्ड निश्चित रूप से बताया जा सकता है। साथ ही इनके संबंध में पुरातत्विक अवशेष (archiological relics) उपलब्ध है। 
श्रीराम और श्रीकृष्ण से पूर्व भी छः अवतार हुएं है (मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम)। किंतु हिंदु धर्मसाहित्य से इनके कालखण्ड संबंधी निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं हो सकती है। इनके संबंध में पुरातत्वीय अवशेष भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए यद्यपि सनातनी हिंदु इन अवतारों पर पूर्ण विश्वास करतें हैं किंतु निश्चित प्रमाण (proof) के अभाव में हम इन्हे इतिहास नहीं कहतें है।

परंतु रामायण और महाभारत ने अपने दुर्दम्य प्रमाणों के साथ इतिहास का स्थान प्राप्त किया है। वैसे तो हम सुनते आएं है कि जिसे इतिहास का ज्ञान ना हो उसका कोई भविष्य नहीं होता है। इसे हमारे ऋषियों ने अत्यंत सुंदर पद्धति से समझाया है:

धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वित। 
पूर्ववृत्तं कथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥ 
[धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष संबंधी उपदेश के साथ पूर्व में घटित वृत्त (कथारूप में) बताए जानेपर इतिहास कहलाता है।]
अर्थात ऐतिहासिक कथाएँ इसलिए बताई जाती है कि इसे हम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष संबंधी उपदेश के साथ मिलाकर देखें (tallying) और इससे हमें हमारे जीवन के लिए मार्गदर्शन प्राप्त हो सकें।

प्रभु अब अर्जुन से जो कह रहें है वह आधुनिक युग में भी प्रासंगिक है। 
उनके उपदेश का तात्पर्य है कि इस युद्ध में भाग ना लेने का अर्थ है धर्मच्युत होना (कर्तव्य से मुख मोडना)। और कर्तव्यकर्म टालना यह पापकर्म है। इस प्रकार के पाप जो करते है वह अपनी पूर्व में अर्जित किर्ती भी गँवा देते है।

यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं था, हमारे लिए भी है !
हमारे जीवन में हमें ऐसा कोई युद्ध तो नहीं करना होगा किंतु वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में कर्तव्यपालन करना यही हमारा धर्म है ।
हम इसे कुछ उदाहरणों से समझ सकते है।

वैयक्तिक जीवन में कुटुंब का पालनपोषण करना, माता - पिता, गुरुजनों की सेवा करना, बच्चों को अच्छे संस्कार देना, समाज के लिए आर्थिक सहयोग देना व सामाजिक कार्यों में, सामूहिक धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेना आदि अनेक कर्तव्य होते है।
इनके साथ ही अन्य किसी भी व्यक्ति द्वारा वृद्धों पर अत्याचार करना, प्राणियों की अवहेलना कर उन्हे पीडा देना, जलाशयों को प्रदुषित करना, सार्वजनिक नलों को खुला छोडकर स्वच्छ पानी को नष्ट करना, घर से बाहर किसी भी स्थान पर कूडा अथवा प्लास्टिक पॅकेटस् फेंकना, अंदाधुंद वाहन चलाना आदि घटनाएँ देखने पर उन्हे रोकने के लिए विनम्रता से किंतु दृढता से  (politely but firmly) ऐसे व्यक्ति को रोकना यह हमारा कर्तव्य है!
मुझे क्या करना है, मेरा क्या संबंध है, लोग क्या कहेंगे आदि का भय लेकर अनुचित घटनाओं को ना रोकना भी कर्तव्यच्युत होना ही है और ऐसी भीरुता (cowardliness) हमें पाप के फल की ओर ले जाएगी।
इसी प्रकार सुरक्षाकर्मियों का (पुलिस) को अपराधियों सेनाधिकारी, सैनिक आदि का कर्तव्य है आदेश के अनुसार युद्ध करना।

गीता का पठन और अभ्यास करना आवश्यक है ही, परंतु उसके उपदेश नुसार आचरण करना और भी आवश्यक है !
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क्रमशः
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