हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६०

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । 
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥३२॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
प्राप्त झालें अनायासें स्वर्गाचे द्वार मोकळें ।
क्षत्रियांस महा - भाग्ये लाभतें युद्ध हे असें ॥३२॥
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इस श्लोक में श्रीभगवान् ने कर्तव्यपालन की महत्ता का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है ।
प्रभु कह रहें है कि इस युद्धक्षेत्र के मार्ग से तुम्हे स्वर्ग में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है क्योंकि किसी भी क्षत्रिय के लिए दुर्लभ ऐसा युद्ध करने का अवसर तुम्हे प्राप्त हुआ है।

वस्तुतः युद्ध के परिणाम भयंकर होते है। प्रचंड संख्या में नरसंहार के कारण समाज असंतुलित होता है (अर्थात सामान्यतः पुरुषों की संख्या असाधारण रूप से घटती है), लोगों को आप्तजनों की मृत्यु सहन करनी पडती है और परिवार बिखर जाते है, संसाधन (resources) युद्धकार्य के लिए उपयोग किए जाते है जिस कारण कल्याणकारी योजनाएँ (welfare schemes) व विकास कार्यों के लिए कम पडते है, राज्य की यंत्रणा प्रत्यक्ष युद्ध में व युद्धक्षेत्र में शस्त्र व सुविधाएँ जुटाने में व्यस्त होने के कारण राज्य के अंतर्गत व्यवहारों में अव्यवस्था हो सकती है ..

युद्ध के इन परिणामों की जानकारी क्या प्रभु को नहीं है ?
जरासंध ने जब अपने जामाता (Son-in-law) कंस की मृत्यु से क्रोधित होकर मथुरा पर सत्रह बार धावा बोला था। सत्रह बार युध्द हुए और प्रभु ने प्रत्येक समय उसे पराजित किया था। परंतु मथुरा की प्रजा को जरासंध के आक्रमणों के कारण जो असुविधाएँ झेलनी पड रहीं थी उनसे उन्हे बचाने के लिए प्रभु ने  द्वारका नगरी का निर्माण कर यादवों को वहाँ बसा दिया था।

तो अब वही श्रीकृष्ण अर्जुन से यह यह क्यों कह रहे है कि ऐसे युद्ध का अवसर क्षत्रियों को भाग्य से मिलता है?

शरीर के किसी अंग में गँगरीन होनेपर उसे काटना पडता है। अन्यथा शरीर के अन्य भागों में भी उसका प्रादुर्भाव होकर अंततः प्राणों पर संकट आ सकता है। 
इसी प्रकार जब समाज में अधर्मी और अत्याचारियों की संख्या व बल बढ जाता है तब उनका संहार एक एक कर नहीं किया जा सकता है। युद्ध में अधिक संख्या में उन्हे मृत्युमुख में भेजना ही आवश्यक हो जाता है। 

इस संदर्भ में विदुरनीति में भी विचार व्यक्त किए गएं है।
महाभारत में विदुर का वर्णन न्यायी, ज्ञानी और संयमी महापुरुष के रूप में किया गया है । वह कहते है -

त्यजेत एकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत | 
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथ्वीं त्यजेत || 

(अर्थ : कुटुम्ब के लिए स्वयं के स्वार्थ का त्याग करना चाहिए, गाँव के लिए कुटुम्ब का त्याग करना चाहिए, देश के लिए गाँव का त्याग करना चाहिए और आत्मा के लिए समस्त वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।)
अर्थात, विदुर कर्तव्य व न्याय को विशाल पट पर (on big canvas) देख रहें है। व्यापक जनकल्याण के लिए तात्कालिक हानि को स्वीकार करने का उपदेश कर रहे है (sustaining temporary loss for greater good)।

श्रीभगवान का उपदेश भी इसी नीति को अधोरेखांकित (underline) कर रहा है। वह जानते है कि युद्ध के अल्पकालीन परिणाम गंभीर हो सकते है और कदाचित दीर्घकाल तक भी संकट का कोहरा (fog) बना रह सकता है। परंतु उनके कथन का तात्पर्य है (संधि करने के सभी प्रयत्न निष्फल होनेपर भी) युद्ध करना यदि टाल दिया जाए तो उसके परिणाम भविष्यकाल में अधिक विनाशकारी हो सकते है। 

इसलिए क्षत्रिय को यदि ऐसी स्थिति दिखाई दे जहाँ अधर्म समाज पर हावी हो रहा है और सज्जनों की स्थिति दयनीय है, जहाँ सत्ताधारियों की लालसा ने प्रजा को और अन्य राजसमाज को भी आतंकित कर रखा है, जहाँ शासनयंत्रणा का उपयोग प्रजाजनों के हित के लिए नहीं, अपितु राजा की सत्ता कायम रखने के लिए किया जा रहा है, वहाँ क्षत्रिय का धर्म है कि वह शस्त्र उठाकर अन्यायी सत्ताधारियों को शासन करें (to Punish arrogant rulers)।

प्रभु अर्जुन कह रहें है कि उन्मत्त सत्ताधारी और उसके सहयोगियों को शासन करने का दुर्लभ (rear) भाग्य तुम्हे मिल रहा है और इस कार्य को पूर्ण करने पर तुम्हे (मृत्युपश्चात) स्वर्ग का लाभ होगा यह निश्चित हैं !
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क्रमशः
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