हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६३
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥३५॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
भिऊनि टाळिले युद्ध मानितील महारथी ।
असूनि मान्य तू ह्यांस तुच्छता पावशील की॥३५॥
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मनुष्य की मनोदशा बदलती रहतीं है। कभी वह अत्यंत उत्साही तो कभी निराश होगा।
कभी विनम्र होगा तो कभी क्रोधित होकर कटू वचन कहेगा।
कभी व्याकुल - रुंआसा रहेगा तो कभी संतुलित भाव से कठिन परिस्थिति का सामना करेगा।
सामान्य मनुष्यों के जीवन में प्रायः यह सब होता रहता है।
ऐसे समय में उनके कुटुंबिय / मित्र / सहकारी भिन्न भिन्न प्रकार से प्रतिक्रिया देतें है अथवा व्यवहार करतें हैं।
दूसरे व्यक्ति के प्रति प्रेम /सहानूभूति के कारण वह उसके मन की अवस्था समझने का प्रयत्न करतें हैं।
कभी कभी मनुष्य कुछ भी सुनने को प्रस्तुत नहीं होता है। वह दिवस कदाचित उनका का कथन सुनने का हो सकता है।
कभी आवश्यकतानुसार उस व्यक्ति को समझातें है।
अपने प्रिय व्यक्ति के लिए हम जैसे समुपदेशक (councellor) बन जातें हैं !
प्रभु अत्यंत कुशल समुपदेशक है !
इससे पूर्व उन्होंने अर्जुन को मीठी झिडकी दी है, कभी निर्भत्सना की है तो कभी मानव जीवन की क्षुद्रता और आत्मा की निरंतरता का ज्ञान दिया है। अभी वह अर्जुन को पराक्रमी धनुर्धर, अतिरथी के रूप किर्ती कायम रखने के लिए प्रेरित कर रहें है।
वैसे तो अर्जुन ने अपनी तपस्या से बहुत अधिक संयम आत्मसात किया है, परंतु अंततः है तो वह क्षत्रिय ही ! उनके जैसे ख्यातकिर्त (famous) महावीर के लिए विश्व में अपनी कैसी प्रसिद्धी है इसका महत्व है।
प्रभु अर्जुन के सखा है इसलिए वह अर्जुन के मानसिक आंदोलनों से पूर्ण परिचित है। वह जानतें है कि अर्जुन अपनी प्रसिद्धि के विषय में अत्यंत संवेदनशील है। इसी कारण वह अर्जुन से कह रहें है कि इस समय युद्ध ना करने का निर्णय लेनेपर महापराक्रमी वीर भी तुम्हे भीरू (coward) कहेंगे। अबतक जो तुम्हारा सम्मान करते थे, तुम्हारे पराक्रम की प्रशंसा करते थे वह भी तुम्हे युद्ध से भयभीत होनेवाले व्यक्ति कहेंगे।
छोटा बालक तक 'आप तो यह नहीं कर पाओगे' यह सुनकर आहत होता है। अपने आप को सुयोग्य - समर्थ प्रमाणित करने के लिए कठिन कार्य करने को उद्युक्त होता है।
यहाँ तो अर्जुन है!
इसलिए प्रभु प्रयत्न कर रहें है कि किसी प्रकार अर्जुन के मन का अवसाद दूर हो और वह युद्ध के लिए सज्ज हो जाएं।
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क्रमशः
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