हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५४
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।२३।।
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ।।२४।। अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ।। २५॥
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गीताई :
(मराठी अनुवाद आचार्य विनोबा भावे)
शस्त्रे न चिरती ह्यास, ह्यास अग्नि न जाळितो ।
पाणी न भिजवी ह्यास, ह्यास वारा न वाळवी ॥२३॥
चिरवे जाळवे ना ही भिजवे वाळवे हि ना ।
स्थिर निश्चळ हा नित्य सर्वव्यापी सनातन ॥२४॥
न देखूं ये न चिंतू ये बोलिला निर्विकार हा ।
जाणुनि ह्यापरी आत्मा शोक योग्य नसे तुज ॥२५॥
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अध्याय २ : श्लोक २३ से २५ : भाग १
आत्मा के चिरंतन, अविनाशी होने संबधी सरल और विस्तृत विवेचन प्रभु कर रहें है।
आत्मा का भौतिक अस्तित्व और वस्तुमान (physical existence with mass) नहीं होता है।
उसका साकार रूप नहीं है इसलिए उसपर शस्त्र से आघात कर उसे नष्ट नहीं किया जा सकता है, उसे जलाया नहीं जा सकता है।
इसे ना तो पानी से भिगोया जा सकता है ना ही इस बहती पवन सुखा सकती है।
जिस आत्मा को ना काटा जा सकता है, ना भिगोया अथवा सुखाया जा सकता है वह आत्मा अस्तित्व के लिए सीमाओं के बंधन से मुक्त है। वह सर्वव्यापी है अर्थात उसका अस्तित्व किसी निशिष्ट स्थान पर नहीं होता है। वह मुक्त है इसलिए किसी भी स्थान पर और प्रत्येक स्थान पर हो सकता है।
आत्मा का अस्तित्व पुरातन काल से है, मनुष्य की कल्पनाशक्ति भूतकाल में जितना पीछे जा सकती है, आत्मा उससे भी अधिक प्राचीन है क्योंकि आत्मा के अस्तित्व का कोई प्रारंभकाल नहीं हैं। आत्मा का अस्तित्व चिरकाल से है और अनंतकाल तक रहेगा।
आत्मा का दृश्य रूप नहीं है इसलिए इसे मानसिक रूप से भी 'देखा' नहीं जा सकता है। आत्मा की ना कोई इच्छा होती है ना ही उसे काम - क्रोध - लोभ - भय - मद - मत्सर आदि विकार होते है।
वह प्रत्येक समय सृष्टी में विद्यमान होकर भी अदृश्य होता है।
प्रभु ने गीता के इस भाग में आत्मा की निरंतरता (continuity) का विस्तृत वर्णन किया है। वह अर्जुन से कह रहें है कि इस युद्धक्षेत्र में जिनकी भी मृत्यु होगी, उनके केवल देह का नाश होनेवाला है। उनकी आत्मा नए देह में पुनः पुन: अवतरित होती रहेगी इसलिए किसी भी जीवित प्राणी / मनुष्य की मृत्यु का शोक मनाना उचित नहीं हैं ।
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अध्याय २ : श्लोक २३ से २५ : भाग २ - क्रमशः
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