हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६२
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥३४॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
अखंड लोक गातील दुर्ष्किती जगती तुझी ।
मानवंतांस दुर्ष्किती मरणाहुनी आगळी॥३४॥
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अर्जुन की व्याकुल अवस्था का उपचार करते समय श्री भगवान् ने अनेक भूमिकाएँ निभाई है।
कभी वह अर्जुन को सखा होने के नाते संकेत देते है, कभी मित्रता के संबंध के कारण उपहास करते है , कभी वह ज्ञानी गुरुजन समान उपदेश करते है , कभी अर्जुन की मानसिक ग्लानि पर समुपदेशक समान उपचार करते है।
अब प्रभु पुनः एक समुपदेशक की भूमिका में आ गए है।
अर्जुन का पराक्रम सुविख्यात है। प्रभु श्रीराम के पश्चात ऐसा कोई धनुर्धर विश्व में नहीं हुआ था। अपनी असामान्य धनुर्विद्या के कारण अर्जुन ने अनेक युद्धों में प्रचंड विजय प्राप्त किया है। युधिष्ठिर द्वारा इंद्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ करने से पूर्व अर्जुन ने परंपरा के अनुसार उनके लिए दिग्विजय किया था। इस दौरान उन्होन अन्य राजओं से अमाप धन प्राप्त किया था। इतनी प्रचंड मात्रा में धन का संचय करने के कारण अर्जुन 'धनंजय' नाम से प्रसिद्ध हुए थे।
अर्जुन को उनके पराक्रम और यश के कारण प्राप्त हुई किर्ती को प्रभु अब जैसे ललकार रहें है क्योंकि अत्यंत कर्तृत्ववान व्यक्ति के मन में अहंकार ना भी हुआ तो अपने कर्तृत्व का अभिमान होना स्वाभाविक है। यद्यपि अपनी तपस्या के कारण अर्जुन निर्विकल्प समाधी तक पँहुच पाएं थे किंतु उनकी क्षात्रवृत्ति का आधार 'रजोगुण' के तत्व उनमें भी थे।
इसलिए प्रभु अर्जुन को जैसे चिकोटी काट रहें है, यह कहते हुए, कि 'इस प्रकार युद्धविन्मुख हो जाओगे तो विश्व में तुम्हारी अपकिर्ती होगी। तुम्हारा नाम सम्मान से नहीं, अपितु मखौल उडाने (to make fun) के लिए लिया जाएगा। इस प्रकार अपना नाम लिया जाना किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति को मृत्यु से भी भयंकर लगता है !'
अर्जुन कर्तव्यपालन के प्रति सजग और निष्ठावान है...
वह ज्ञानप्राप्ती व अस्त्र प्राप्ती के लिए सदैव उत्सुक है...
भौतिक सुखों का मोह अर्जुन को कभी भी बांध नहीं पाया है...
अर्जुन प्रामाणिक है और अपने विचार अथवा कर्मों पर कभी किसी की उँगली ना उठ पाएं इसलिए व सदैव दक्ष रहतें है...
संभावना यह है कि अपनी दुष्किर्ती की कल्पना से अर्जुन के मन में क्रोध जाग सकता है। इसलिए प्रभु अर्जुन के शिथिल हुए मन में क्षत्रियोचित क्रोध जगाने का प्रयत्न कर रहें है।
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क्रमशः
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