हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५१

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️ श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । 
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ।।१८।। 
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । 
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥१९॥
न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २०॥

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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे )

विनाशी देह हे सारे बोलिलें त्यात शाश्वत ।
नित्य निस्सीम तो आत्मा अर्जुना झुंज यास्तव 
॥१८॥
जो म्हणे मारितो आत्मा आणि जो मरतो म्हणे।
दोघे न जाणती काही न मारी न मरे चि हा॥१९॥
न जन्म पावें न कदापि मृत्यु
होऊ नि मागे न पुढे न होय
आला न गेला स्थिर हा पुराण
मारोत देहासि परी मरेना ॥२०॥
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अध्याय १ : श्लोक १८ से २० : भाग १

गीता के इस भाग में आत्मा के विषय में भगवान श्रीकृष्ण अनेक तथ्यों को उद्घाटित कर रहें है।

विश्व के प्रमुख धर्मों में से केवल हिंदु धर्म में ही पुनर्जन्म को मान्यता है।
अन्य प्रमुख धर्म जिन्हे समुच्चय के रूप में (collectively) Abrahamic religions कहा जाता है वे धर्म है खिश्चन, ज्यू व मुस्लिम। 
इन धर्मों में पुनर्जन्म को मान्यता नहीं हैं। क्योंकि वह जीव का अस्तित्व देह में प्राण होने तक ही मानते है। उनकी मान्यता है कि किसी भी जिवित प्राणी का अस्तित्व उसके जन्म लेनेपर प्रारंभ होता है और मृत्यु होने पर तत्काल समाप्त हो जाता है। 

पाप - पुण्य के विचार इन धर्मों में भी है और इसका निर्णय उन धर्मां की परमोच्च शक्ति अर्थात Jesus Christ / अल्लाह द्वारा किया जाता है। 
ऐसा माना जाता है कि Day of Judgement को मनुष्यों के पापपुण्य का हिसाब किया जाएगा जिसके लिए उनके देह का पुनरुत्थान किया जाएगा। फिर उनके पाप - पुण्य के अनुसार उन्हे Heaven/Hell अथवा जन्नत/ जहन्नुम में भेजा जाएगा। 

इन धर्मों की मान्यता है कि मनुष्य को न्याय के लिए ईश्वर के बुलाने की प्रतिक्षा उसी देह में करनी है। इस कारण देह के पुनरुत्थान के लिए मृत्यु पश्चात देह को दफन किया जाता है ताकि Day of Judgement को उन अवशेषों से पुनः देह निर्माण किया जा सके। मृत व्यक्ति उस अंतिम दिन की प्रतिक्षा शांति से कर सकें इसलिए इन धर्मों में मृत व्यक्ति के लिए 'Rest in Peace (RIP)' ऐसी प्रार्थना की जाती है।

यहुदी धर्म (Judaism) में थोडी भिन्नता है। इन में से एक पंथ का मानना है कि देह का पुनरुत्थान किया जाएगा। दूसरा पंथ मानता है कि आत्मा का पुनरुत्थान किया जाएगा। परंतु इस धर्म में आत्मा का संबंध केवल उस शरीर से होता है। हिंदु धर्म समान एक ही आत्मा पुनःपुनः नए नया शरीर धारण करेगी ऐसा वह नहीं मानते है।

अर्थात हमारे सनातन धर्म में और Abrahamic religions में अंतर यह हुआ कि हम शरीर के साथ अस्तित्व का अंत होता है ऐसे नहीं मानते हैं । हम मानतें है कि आत्मा का शरीर बदलता रहता है जिसे पुनर्जन्म कहा जाता है।

पुनर्जन्म पिछले अनेक जन्मों के कर्मों के फल के रूप में मिलता है। इसे ऐसे देखा जा सकता है कि एक कक्षा में उत्तीर्ण होते समय हमें परिक्षा में जितने गुण मिलते है उससे हमारी अगली कक्षा (section A/B/C/D आदि) कौनसी होगी यह निश्चित होता है। पिछली कक्षा की परिक्षा में यदि अच्छे गुण ना भी मिले हो तब भी अगली कक्षा में अभ्यास बढ़ाकर और अच्छे गुण प्राप्त किए जा सकतें है जिससे अगली कक्षा में अच्छा section प्राप्त किया जा सकें।

इसे आत्मिक उन्नति कहा जाता है और यह अनेक जन्मों के कर्मफल से भी हो सकती है ।
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अध्याय १ : श्लोक १८ से २० : भाग २ : क्रमशः
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