हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५७
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥२८॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
भूतांचे मूळ अव्यक्ति मध्य तो व्यक्त भासतो ।
पुन्हा शेवट अव्यक्ति त्यामधे शोक कायसा॥२८॥
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मानवी जीवन संबंधी तथ्य प्रभु कथन कर रहें है। यह तथ्य सदैव हमारी दृष्टी के सम्मुख होता है, हम उसका अर्थ जानते भी है किंतु सोच समझकर हम उससे मुख मोड लेते हैं क्योंकि वह हमें भौतिक जीवन के प्रति आसक्ति कम करने के कारणों से अवगत कराता है।
श्रीभगवान कह रहें है कि मनुष्य का जब जन्म होता है तो आत्मा उस देह में विराजमान हो जाती है। वैद्यकशास्त्र के अंतर्गत संशोधन और अभ्यास किया गया जिससे गर्भ के विकास की अवस्थाओं के विषय में जानकारी प्राप्त हुई है। किंतु उस देह में आत्मा के प्रवेश का मार्ग अथवा उसका निश्चित कालावधि वैद्यकशास्त्र को ज्ञात नहीं है। परंतु यह निश्चित है कि आत्मा के देहप्रवेश के कारण ही भ्रूण (featus) सजीवों की श्रेणी में आता है। इसलिए प्रभु कह रहें हैं कि पंचमहाभूतों से निर्मित इस देह का प्रारंभ अज्ञात है।
मृत्यु का अर्थ है आत्मा द्वारा देह का त्याग। परंतु किसी व्यक्ति को मृत्युशैय्या (deathbed) पर देखते रहने पर भी हम समझ नहीं पातें है कि अचानक उस देह का चैतन्य लुप्त हो जाने का क्षण कौनसा था। इस प्रकार चैतन्यहीन होने का कोई भी दृश्य कारण बताना संभव नहीं होता है। अर्थात शरीर से प्राण (आत्मा) निकलने का ऐसा कोई दृश्य प्रमाण नहीं होता है।
फिर शरीर से निकले हुए प्राण / आत्मा कहाँ गई, उसकी अगली यात्रा कैसे होगी इस संबंध में भी कोई तर्क संभव नहीं है।
शरीर में प्राणों का आकर बस जाना और उनका शरीर को छोडकर जाना इनके मध्य का काल 'मनुष्य का जीवन' कहलाता है।
देखा जाए तो यह एक सुरंग (tunnel) के समान है। एक सुरंग की यात्रा पूर्ण होते ही आत्मा मनुष्य को अज्ञात विश्व में वास करती है, फिर दूसरा देह धारण करती है। अर्थात मनुष्य जीवन के दोनो छोर (before starting point & after end point) हमें अज्ञात है। और आत्मा की यात्रा में पुनर्जन्म नामक ऐसे सुरंग आते रहतें है।
मनुष्य की भूल यह है कि वह इन सुरंगों को ही सर्वस्व मान लेता है।
मनुष्य जीवन में अनेक प्रकार के लोग मिलेंगे, उनका व्यवहार उनके अपने विचार - वृत्ति के अनुरूप होगा, कभी कभी हमें उससे असुविधा भी हो सकती है, किंतु हम उसी को असाधारण रूप में बडा कर (magnify) देखने लगते है। किसी ने उपेक्षा की, अपशब्द कहें, धृष्टता से बात / व्यवहार किया (indecent behaviour), क्रोध से कुछ कह दिया तो हमें लगता हैं कि हमारा अपमान हुआ है। ऐसे में हम उस व्यक्ति / व्यक्तियों के प्रति मन में कडवाहट पालते है, कभी कभी अपने शब्दों अथवा व्यवहार से पलटवार भी करते है। कभी कभी उस व्यक्ति से संबंध तोड लेतें है।
यदि हमारे मन में कुछ इच्छा हो और वह पूर्ण नहीं हो पा रहीं है परंतु वह सुख दूसरे किसी व्यक्ति को मिल रहा हो तो हमें अनेक बार ईर्ष्या (envy) होती है।
कभी कभी हम दूसरे व्यक्तियों से कुछ अपेक्षाएँ करते है। उस व्यक्ति ने उन्हे पूर्ण नहीं किया अथवा उसे महत्व नहीं दिया तो हम उस व्यक्ति के लिए मन में कडवी भावनाएँ पाल लेते है।
कितना कुछ घटित होता रहता है मनुष्य के मन में !
ऐसे नकारात्मक विचारों के परिणामस्वरूप हम दूसरे लोगों पर कडवे शब्दों की बौछार और रुखा व्यवहार करतें है !
परंतु देखा जाए तो यह सब एक सुरंग में हो रहा है, एक छोटी सी सुरंग जिसे हमारी आत्मा त्यागने वाली है और इसी सत्य से मुख मोडकर हम अपने मन को मैला कर रहें है !
अथवा, हम रोटी / पूडी बनाते है। लोई को बेलनेपर जब रोटी सेंकते है / पूडी तलते है तो वह बीच में से फूल जाती है। दिखती सुंदर है किंतु उसके अंदर क्या है ?
केवल हवा !
रोटी / पूडी को दाँत लगाते ही उसके भीतर के खोखले भाग में जमा हुई हवा निकल जाएगी। अर्थात हवा का वहाँ रहना अल्पकाल के लिए है।
मनुष्यजीवन ऐसा ही है। बडा सुंदर, लुभावना दिखता है, किंतु है अल्पजीवी !
आजकल कॉफी, मिल्कशेक आदि होटल / कॅफे में मिलतें है। पदार्थ के उपर फूला हुआ 'फोम' होता है। पदार्थ का स्वाद जैसा भी हो किंतु फोम अत्यंत लुभावना दिखता है। मानवी जीवन उस फोम जैसा है। दिखता बहुत बडा है किंतु महत्व पदार्थ (आत्मा) का है, फोम (देह) का नहीं !
श्रीभगवान इसी लिए कह रहें कि जिस मनुष्यजीवन का आरंभ और अंत दोनो ही दृश्यमान (visible) नहीं है और जिसका मध्य (मानव का जीवन काल) अल्प अवधि के लिए दृश्यमान होना निश्चित है उस मानव देह के नष्ट होने का शोक करना औचित्यपूर्ण नहीं है।
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क्रमशः
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