हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५६
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ।॥२६॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७।।
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गीताई :
(मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
अथवा पाहसी तूं हा मरे - जन्मे प्रतिक्षणी ।
तरी तुज कुठे येथे नसे शोकास कारण॥२६॥
जन्मता निश्चये मृत्यु , मरता जन्म निश्चये।
म्हणून न टळे त्याचा व्यर्थ शोक करू नको॥२७॥
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श्रीभगवान अर्जुन से कह रहें है कि हम जीवन में सदैव जन्म और मृत्यु होते हुए देखते है। यद्यपि बालक/बालिका का जन्म आनंद का पर्व होता है और आत्मीय जनों के मृत्यु पर शोक ही होता है, परंतु जन्म और मृत्यु दोनो ही जीवन के अटल सत्य होने के कारण (जन्म पर उत्सव मनाना यदि समर्थनीय है तब भी) मृत्यु का (अति) शोक मनाना उचित नहीं है। क्योंकि जैसे ही प्राणी / मनुष्य का जन्म होता है उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है। जन्म और मृत्यु नदी के निरंतर बहते प्रवाह के समान है। इसलिए इस निश्चित / अटल / अपरिवर्तनीय घटना के लिए दुखी होना और उसे टालने के प्रयत्न में धर्मच्युत होना ज्ञानी मनुष्य को शोभा नहीं देता है।
कर्तव्यपालन, धर्मपरायणता और धर्मरक्षा इन तत्वों के लिए प्रभु का दृष्टीकोण और विचार विशाल और गहन है। अनेक बार मरुभूमि में शाद्वल (oasis) दिखाई देता है जिसमें पानी का आभास होता है किंतु वहाँ वास्तव में पानी नहीं, रेत ही होती है। वह आँखो के लिए और मन के लिए भ्रम होता है। मनुष्य का जन्म और मृत्यु भी इसी प्रकार भ्रम है। जैसे हम TV screen पर अनेक दृष्य देखतें है जिसमें मनुष्य एक दूसरे के साथ हँसते - बोलतें है, क्रोध से हिंसा भी करतें है , कभी उसमें बालजन्म के पश्चात आनंदपर्व देखतें है तो कभी मृत्यु भी देखतें है। उस विशिष्ट कथा के संदर्भ में वह सत्य होता है । किंतु screen पर यदि हिंसा, मारकाट हुई हो तब भी वह screen वैसा ही बना रहता है , टूटता - बिखरता नहीं है।
मनुष्य के जन्म उस screen पर चलनेवाली कथा समान है। सत्य है फिर भी भी आभास ही है और आत्मा screen जैसा अपरिवर्तनीय है !
इसी कारण प्रभु अर्जुन को स्पष्ट रूप से बता रहें हैं कि जिस व्यक्ति धर्मरत रहने की इच्छा हो और उसके लिए त्याग करने का सामर्थ्य हो ऐसे व्यक्ति को तो 'धर्म' इस कल्पना को और अधिक गहराई से सोचना चाहिए।
अर्जुन का मन कातर हुआ जा रहा है अपने प्रिय पितामह और श्रद्धेय गुरु के लिए। परंतु प्रभु तो उनके लिए भी 'जन्म होते ही मृत्यु निश्चित है' यह आग्रहपूर्वक कह रहें है ।
तो क्या परम पवित्र, महान त्यागी, अत्यंत निर्मोही, वीर पितामह और अर्जुन के श्रेष्ठ गुरु द्रोणाचार्य का भी अपवाद नहीं करेंगे प्रभु ?
नहीं करेंगे !
क्योंकि जो धर्म के साथ नहीं है उनकी मृत्यु पर शोकग्रस्त होने को प्रभु अयोग्य बता रहें है !
पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य कैसे धर्मच्युत हुए है?
यह सत्य है कि वह दुर्योधन के पक्ष से युद्ध करने के लिए सज्ज हुए है, परंतु वह स्वयं तो अधर्मी नहीं हैं !
तब उनके लिए भी कठोर होना और उनपर शस्त्र उठाने का निषेध ना करना कैसे समर्थनीय हो सकता है?
श्रीभगवान का विचार स्पष्ट है। मनुष्य स्वयं अधर्मी हो ना हो, किंतु यदि वह अधर्मी का साथ दे रहा हो और उसके कारण अधर्मी सबल हो रहा हो तो आवश्यक होने पर उसका वध करना भी धर्म ही है और ऐसी मृत्यु होने की संभावना से व्याकुल भी नहीं होना चाहिए। उस जीव की आत्मा का नया देह धारण कर पृथ्वी पर अवतरित होना जब सुनिश्चित है तो शोक करना उचित नहीं है इस पर श्रीभगवान बल दे रहें है ।
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क्रमशः
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