हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५८
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥२९॥
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥३०॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
आश्चर्य जो साच चि ह्यास देखे
आश्चर्य जो देखत ह्यास वर्णी ।
आश्चर्य जो वर्णन ते हि ऐके
ऐके तरी शून्य चि जाणण्याचे॥२९॥
वसे देहांत सर्वांच्या आत्मा अमर नित्य हा
म्हणूनि भूत - मात्री तूं नको शोक करू कधी ॥ ३०॥
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श्रीभगवान ने दूसरे अध्याय में आत्मा के विषय में विस्तृत विवेचन किया है ।
किंतु हम सामान्य जन कदाचित इस विवेचन के पश्चात भी आत्मा नामक तथ्य को समझ नहीं पाते है।
घोडे की आँखो पर पट्टी (blinkers) बांधने के कारण उसकी दृष्टी संकुचित हो जाती है, वह केवल एक ही दिशा में मर्यादित दृश्य देख पाता है। हम सामान्य जनों की अंतर्दृष्टी पर भी सांसारिक उपलब्धियाँ और दायित्वों की पट्टी चढी हुई है। हम उसके परे जाकर 'अदृश्य' को मन की आँखों से दृश्यमान करने की आकांक्षा नहीं रखते है !
प्रभु अर्जुन को बता रहें है कि कुछ लोग आत्मा के विषय को आश्चर्य से देखतें है , कुछ उसका आश्चर्य के समान वर्णन करतें है , कुछ आश्चर्य के समान सुनते है और कुछ उसे सुनकर भी नहीं समझ पातें है । अर्थात आत्मा के संबंध में ज्ञान प्राप्त करना / आत्मा को पूर्णरूप से समझना दुर्लभ है ।
परंतु आत्मा प्रत्येक जिवित व्यक्ति के देह में वास करती है और वह अमर होती है।
उसका वध करना संभव नही है।
जिसका भौतिक अस्तित्व है वह कभी ना कभी, किसी ना किसी प्रकार से नष्ट हो सकता है किंतु आत्मा अवध्य है (जिसका वध नहीं किया जा सकता है)।
श्रीभगवान अर्जुन से कह रहें है कि प्रत्येक जिवित प्राणी के देह में आत्मा का निवास अवश्य होता है परंतु देह नष्ट होने पर भी आत्मा का नष्ट होना संभव नहीं है। इसलिए किसी के भी प्रति मोहाविष्ट होकर उनकी मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए।
प्रभु तो फिर भी जीवित मनुष्य के मृत्यु की बात कर रहे है परंतु हम सामान्य व्यक्तियों की ठिठाई इतनी अधिक होती है कि हम निर्जिव / जड वस्तु के लिए भी माया पाल लेते है।
किसी के कारण वह वस्तु टूट गई, नष्ट हो गई अथवा खो गई तो हमें क्रोध आता है। कभी उस व्यक्ति के समक्ष अथवा अपरोक्ष भी हम कडवी बात करते है। वस्तु के लिए ऐसा शोक मनाते है जैसे हमारे प्राण उसमें बसे हुए हो।
परंतु हमें सोचना चाहिए कि जिस सृष्टी में अपनों की मृत्यु तक को हम रोक नहीं पातें है उस सृष्टी में किसी निर्जीव वस्तु का कितना महत्व होना चाहिए।
प्रभु यहाँ अर्जुन को आत्मा जैसे गूढ विषय का ज्ञान दे रहें है । इस ज्ञान भाण्डार से यदि हम भी अमृतकण लेने का प्रयत्न करेंगे तो हमारे भी मन की भ्रांतियाँ दूर होंगी और हम शुद्ध सात्विक भक्तिमार्ग पर आगे बढ पाएंगे।
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क्रमशः
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