हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २५५

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । 
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।२३।।
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । 
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ।।२४।। अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । 
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ।। २५॥
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गीताई :
(मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
शस्त्रे न चिरती ह्यास, ह्यास अग्नि न जाळितो ।
पाणी न भिजवी ह्यास, ह्यास वारा न वाळवी ॥२३॥
चिरवे जाळवे ना ही भिजवे वाळवे हि ना ।
स्थिर निश्चळ हा नित्य सर्वव्यापी सनातन ॥२४॥
न देखूं ये न चिंतू ये बोलिला निर्विकार हा ।
जाणुनि ह्यापरी आत्मा शोक योग्य नसे तुज ॥२५॥
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अध्याय २ : श्लोक २३ से २५ : भाग २

आत्मा के अमरत्व का वर्णन करते हुए प्रभु ने अर्जुन से कहा है कि देहधारी की मृत्यु का शोक करना उचित नहीं है क्योंकि जीव का मूलतत्व आत्मा तो चिरंजीव है, इसलिए एक देह के नाश का शोक करना योग्य नहीं है ।

परंतु क्या यह संभव है ?
प्रियजनों की मृत्यु का शोक ना करने कैसे संभव होगा ?
जिनसे लगाव है, प्रेम है उनकी मृत्यु का शोक भी स्वाभाविक ही है। क्योंकि किसी के भी मृत्यु का शोक ना करने का अर्थ भावनाविहीनता (emotionless) होगा। यदि इस प्रकार भावनाओं को त्यागकर जीवन जीना है तो फिर मनुष्यजन्म की सार्थकता किसमें है ?
केवल कर्तव्य के लिए ?
और अनेकों बार हमारी कर्तव्यपूर्ति के मूल में भी प्रेम होता है, देखा जाए तो प्रेम और कर्तव्य अधिकांश समय एक दूसरे में उलझे हुए होते हैं। जैसे मातापिता के वृद्धत्व में उनकी सेवा करना, बच्चों के पालनपोषण के समय अपने विविध सुखों का त्याग कर उन्हे समय देना , सगेसंबंधियों के कठिन समय में उनका साथ देना आदि। इन सबके मूल में यदि प्रेम ना हो तो हमारे कर्तव्यकर्म कितने खोखले और निरस (hollow & superficial/mechanical) होंगे !
ऐसे रुचिहीन और यांत्रिक जीवन की कल्पना तो नहीं कर रहें होंगे प्रभु ! 

हमें प्रभु के उपदेश के सार पर विचार करना होगा !
हम एक रूपक के माध्यम से विचार कर सकते है।
जैसे तैराक जब तैरने के लिए पानी में उतरते है, चाहे वह स्विमिंग पूल हो, तालाब अथवा नदी हो या सागर ही हो, वह जलक्रीडा का पूर्ण आनंद लेते है, विविध प्रकार से तैरते है जैसे freestyle, backstroke, breaststroke, butterfly आदि। कभी वह dive भी कर लेते है। पूर्ण समय वह पानी की शीतलता का, पानी में शरीर के हलकेपन का आनंद लेते है। तालाब - नदी - सागर में तैरनेवालों के भाग्य में खुली हवा और विशाल गगन तले तैरने का भी आनंद होता है।
परंतु , प्रत्येक तैराक जानता है कि पानी उसका स्थायी (permanent) निवासस्थान नहीं है। उसे पानी से बाहर आना ही होगा। पानी के बाहर आकर वह पुनः अपनी नियमित दिनचर्या प्रारंभ करता है।

तैराक जितने समय पानी में रहते है, वह जलक्रीडा का आनंद लेते है। परंतु उसे वह सर्वस्व नहीं मानते है। इसी प्रकार मनुष्यजन्म में भी रहने का उपदेश प्रभु कर रहें है।

प्रभु ने स्वयं इसी ज्ञानभांडार के अनुरूप आचरण जीवन व्यतीत किया है। उनके जीवन में इसके अनेक उदाहरण देखें जा सकते है।
बाल्यावस्था में वह गोकुल और वृन्दावन में गोपालों के मध्य रहें । गोप-गोपियों ने उन्हे वात्सल्य, प्रेम, मित्रता इन सभी भावनाओं का अत्युच्च आनंद दिया। बालकृष्ण ने भी उन्हे अपनी बाललीलाओं से अभिभूत किया था, बालमित्रों के साथ उनके संबंध जैसे उदाहरण बिरले (rare) ही होंगे। और यह सब उन्होने स्वाभाविक रूप से किया था, उसमें कृत्रिमता नहीं थी। 
परंतु जब वृन्दावन से मथुरा जाने का समय आया तब सभी जान गए थे कि यह बिदाई जीवनभर के लिए है, वह कभी भी वृन्दावन में लौटकर नहीं आ पाएंगे। सारा वृन्दावन दुख में डूब गया था। वहाँ रहते हुए बालकृष्ण ने सबको आनंदसागर की अनुभूति दी थी परंतु कर्तव्यपूर्ति के लिए मथुरा जाने का समय आनेपर श्रीकृष्ण को वृन्दावन के मोह ने जकडा नहीं था, वह सहज कर्तव्यभाव से अगले पडाव की ओर निकल पडे थे।

कुरुक्षेत्र पर युद्ध से पूर्व भी प्रभु के लिए अपने सगे संबंधियों का विरोध करने की / उनपर शस्त्र उठाने की परिस्थितियाँ निर्माण हुई थी। तब भी प्रभु ने संबंधों से अधिक न्याय के पक्ष का विचार कर अपने निर्णय लिए थे। कंस - जरासंध - शिशुपाल इन संबधीयों के वध का उदाहरण हो, कुरुक्षेत्र पर श्रीकृष्ण पत्नी मित्रविंदा के भ्राता विंद और अनुविंद का वध करने का निर्णय हो, अपने समधी कृतवर्मा (श्रीकृष्ण की पुत्री चारुमति के ससुर) संबंधी 'दुर्योधन पक्ष के योध्दा' यह भाव जागृत रखने का उदाहरण हो, प्रभु ने सदैव 'न्याय के पक्ष में कौन है और कौन अन्याय का साथ दे रहा है' इस स्थिति को देखकर ही निर्णय लिया है। 
युद्ध से पूर्व अधिकांश यादवों ने लालच में श्रीकृष्ण का त्याग कर दिया था और युद्ध से पूर्व उनके ज्येष्ठ भ्राता बलराम तक ने पाण्डव पक्ष के साथ जाने के उनके निर्णय के प्रति अपना रोष प्रकट किया और वह श्रीकृष्ण से असहमति जताकर तीर्थयात्रा के लिए निकल पडें। उनके साथ श्रीकृष्ण के पुत्र सांब (जांबवती का पुत्र) और चारुदेष्ण (रुक्मिणी का पुत्र) भी चले गए, उन्होने अपने पिता का साथ नहीं दिया था, तब भी श्रीकृष्ण ने 'अपनों' के मोह से बद्ध होकर पाण्डवों को त्याग नहीं दिया था। अन्य कोई भी साथ हो अथवा ना हो, परंतु वह स्वयं केवल धर्म के ही साथ खडे रहेंगे यह उनका निर्णय सर्वोपरी (non-negotiable) था।  

इसी लिए श्रीकृष्ण कह रहें है कि देह तो अल्पकाल के लिए होता है। परंतु आत्मा की शुद्धता बनाए रखने के लिए धर्म को प्रमुख मानकर ही सामान्य मनुष्य भी जीवन में आनेवाले विविध संबंध, परिस्थितियाँ इनके प्रति अपनी मनोभूमिका बनाकर कार्य करें जिसमें समर्पण भाव होना चाहिए किंतु उस समय भी मनुष्य जन्म की तात्कालिकता (अल्प काल का अस्तित्व) का स्मरण रखना चाहिए, भावनाओं के सैलाब में मनुष्य को अपना धर्म बहा नहीं देना है यह प्रभु ने सूचित किया है।
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क्रमशः
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