हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६४

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । 
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ।।३६।।
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे) :
बोलितील तुझे शत्रु भलतें भलतें बहु। 
निंदितील तुझे शौर्य काय त्याहूनि दुःखद॥३६॥
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सामान्य मनुष्य भी किसी के निंदा करने पर आहत होता है। क्योंकि मनुष्य का अहंकार अत्यंत बलवान होता है। मनुष्य अपने आप को यदि आदर्श ना भी मानता हो तब भी किसी के निंदा करने से अपमान का अनुभव करता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति यह सोचता है कि यदि उससे कोई भूलचूक हुई भी है तो उसके कारण दूसरों में थे। वह अपने व्यक्तित्व में खामियाँ देखता ही नहीं है।
इसलिए, किसी और व्यक्ति ने उसके व्यवहार पर यदि उँगली उठा दी तो उसका अहंकार फुफकार कर उठ  खडा हो जाता है। और फिर यदि उसके विरोधक / शत्रु उसके व्यवहार की निंदा कर यह कहें की यह उसके कायरता का परिणाम है, तब तो उसका मन क्रोध से जलने लग जाएं यह स्वाभाविक है।
यहाँ सीधे सीधे अर्जुन कि क्षमता पर अन्य लोगों द्वारा उँगली उठाने की संभावना प्रभु बता रहें है !
अर्थात प्रभु द्वारा समुपदेशन का सत्र अभी जारी है कि किसी प्रकार अर्जुन का रजोगुण प्रकट हो, उसका क्षात्रतेज उसके मन की खिन्नता दूर करें और दिप्तीमान सूर्य के समान अर्जुन अपने पराक्रम की आभा से शत्रु को भयाक्रांत कर कौरवसेना पर टूट पडने को आतुर हो जाएं।

प्रभु का संयम देखिए !
युद्ध के पहले बहुत विचारविमर्श हुआ था। संधी  (compramise) का प्रयत्न भी किया गया था। किंतु दुर्योधन का हठ और उसकी लालसा के कारण अपने अधिकार की रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए पाण्डवों ने निरुपाय होकर युद्ध का निर्णय लिया था। युद्ध के लिए अनिच्छा होनेपर भी अर्जुन ने सहमति दी थी। 
धृतराष्ट्र की संमति से दुर्योधन जिस प्रकार हस्तिनापुर का राज्य हथियाएं बैठा था और पाण्डवों का अपमान वह जिस प्रकार करता रहा था उसकी चुभन अंततः असहनीय होकर अर्जुन जैसा निग्रही, संयमी योध्दा युद्ध के लिए मान गया था।
और अब उन्ही अर्जुन ने 'युद्ध नहीं करूंगा' कहकर बालक समान हठ करते हुए शस्त्र त्याग दिए है !

इस प्रसंग के कितने समांतर प्रसंग हमारे जीवन में भी आते है !
एक व्यक्ति कोई निर्णय ले लें और उसे निभाने का प्रसंग आनेपर पीछे हट जाएं ऐसी स्थिति में अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर उसके साथ आएं उसके हितैषी क्या प्रभु जितने संयमी रह पाएंगे ?
हमें क्रोध आएगा..
हम उस व्यक्ति से कटू वचन कहेंगे..
कदाचित हम उससे संबंध तोड देंगे..
अन्य लोगों के सामने हम उसकी निंदा करेंगे..
साधारणतया सामान्य मनुष्यों के साथ यही सब होता है।

भगवान श्रीकृष्ण इतने सामान्य धरातल पर ना सोचते है ना कर्म करते है। उनका प्रत्येक वचन और प्रत्येक कृति भविष्यवेधी होती है। वह सदैव यह विचार करतें है कि उनके द्वारा उच्चारित शब्द और उनके कर्म का परिणाम क्या होग, बाकी लोग उसका किस प्रकार अनुकरण करेंगे और उससे समाजजीवन कौनसी दिशा में आगे बढ़ेगा।
इस कारण प्रभु अर्जुन को समझाने का प्रयास जारी रखे हुए है।
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क्रमशः
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