हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६९

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। 
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥३८॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
हानि लाभ सुखे दुःखे हार जीत करी सम। 
मग युद्धांस हो सज्ज न लागें पाप ते तुज ॥३८॥
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अध्याय-२ :श्लोक ३८- भाग २ 

द्वापारयुग के अंतिम चरण में महाभारत का युद्ध हुआ था जो गीतोपदेश का भी काल है। भगवान श्रीकृष्ण के देहत्याग के साथ ही द्वापारयुग समाप्त हुआ और कलियुग का प्रारंभ हुआ।

केवल युग नहीं बदला है, सारी परिस्थितियाँ ही बदल गई है। समाज की रचना, मनुष्यों की जीवनशैली और उनकी धारणाएँ (viewpoint), सामाजिक मूल्यों के संबंध में उनके विचार, मनोरंजन के साधन और जीवन में उनका महत्व इत्यादि बदलावों के साथ जीवन के प्रति मनुष्यों का दृष्टीकोण भी बदल गया है।

इसलिए आज के युग में गीता की सार्थकता क्या है यह सोचना और अधिक आवश्यक हो जाता है।

प्रभु ने इस श्लोक में अर्जुन को जो उपदेश किया है उसका अनुकरण हम अपने दैनंदिन जीवन में कैसे कर सकते है इस पर हम कुछ उदाहरणों के माध्यम विचार कर सकतें है, किंतु प्रत्येक मनुष्य का जीवन एक समान नहीं होता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए मार्ग स्वयं बनाना होगा।

अपने दैनंदिन जीवन में हमें अनेक व्यक्तियों के कारण अच्छे बुरे सभी प्रकार के अनुभव आतें है। जिन व्यक्तियों के कारण हमें बुरे अनुभव आएं है उनके प्रति हमारा मन मैला हो जाता है। हमारे मन की ऐसी कडवाहट के कारण उनके प्रति हमारा व्यवहार सामान्य नहीं रह पाता है।
जैसे, परिवार / सगेसंबंधी / मित्र इनमें किसी व्यक्ति से हम रुष्ट (unhappy/angry) है तो उनके साथ हमारे व्यवहार में खटास झलकती है।

पडोसियों के साथ व्यवहार में हम प्रायः हिसाब करतें है। जैसे, वह अनेक दिनों के बाद गाँव वापस आएं तो उन्हें चायपानी पूछना, नाश्ता / खाना इ . के लिए बुलाना आदि। मन में भाव होता है कि 'वह करतें है क्या यह सब हमारे लिए ? तभी हम करेंगे!'

कभी कभी कार्यालय में किसी व्यक्ति के साथ अनबन हो जाती है अथवा कोई व्यक्ति हमें अच्छा नहीं लगता है। कभी वह हमारे पास सलाह के लिए अथवा सहायता के लिए आएंगे तो हम जैसे तैसे कुछ बता भी दें परंतु मन से बारीकियाँ नहीं समझातें है।

कभी रास्ते में छोटा - मोटा अपघात हुआ देखतें है तो आवश्यक नहीं की प्रत्येक व्यक्ति वहाँ रुककर सहायता कर दें । लोग ऐसा भी सोचते है कि 'हम तो इन्हे जानते भी नहीं है। जिससे परिचय ना हों उसकी सहायता ना करने से ऐसी क्या हानि होगी !'

प्रसंग चाहे छोटे ही हो, अर्जुन के लिए जैसा धर्मसंकट था वैसे ना भी हो, किंतु हमारा व्यवहार हमारी सोच का परिचायक होता है। जिस व्यक्ति की सोच उनके अपने लाभ - हानी, सुख - दुख के विचारों में ही उलझी रहती हो उसका मन 'न्यायसंगत क्या है ' यह सोच नहीं सकता है। ऐसे में उल्टे स्वयं की हानि होने की संभावना रहती है।

और हानि भी कैसी ? 
वह कोई कुरुक्षेत्र के युद्ध में पराजय जैसी बडी तो नहीं होगी परंतु असुविधा तो हो ही सकती है।

जैसे पडोसियों से / सोसायटी के गार्ड से अच्छे संबंध ना रखनेपर हमारी अनुपस्थिति में आएं हुए पत्र / पार्सल नहीं मिलेंगे...
कार्यालय में सबसे अच्छे संबंध ना रखें तो महत्वपूर्ण दस्तावेज अथवा आवश्यकता होनेपर सहायता मिलने में कठिनाई हो सकती है...

वास्तव में हमारी अपनी मनःशांति के लिए सबके साथ सामान्य व्यवहार करना उपयुक्त हो सकता है। अर्थात अच्छा व्यवहार भी स्वार्थ की ही उत्पत्ति होगी। किंतु बुरा सोचकर बुरा करने से तो यह अच्छा है कि स्वयं के लाभ के लिए हम अच्छा व्यवहार आरंभ तो करें ! हो सकता है कि यही हमारी आदत बन जाएं और धीरे धीरे वैसा स्वभाव भी हो जाएं। 
आसान तो यह नहीं होगा परंतु प्रयत्न किया जा सकता है !
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 क्रमशः
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