हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६५

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । 
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥३७॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
मेल्याने भोगिसी स्वर्ग जिंकिल्याने मही - तळ। 
म्हणूनि अर्जुना उठ युद्धास दृढ निश्चये ॥३७॥
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अध्याय २: श्लोक ३७: भाग १

प्रभु अर्जुन से कह रहें है कि 'इस युद्ध में यदि तुम्हारी मृत्यु होती है तो तुम्हे स्वर्ग की प्राप्ती होगी। और (शत्रु को मारकर) यदि तुम युद्ध में विजयी होते हो तो पृथ्वीपर राज्यसुख की प्राप्ती होगी। अत: हे कुन्तीपुत्र, तुम्हे युद्ध करने का निश्चय करना चाहिए!'

परंतु अर्जुन ने तो कह दिया था कि आप्त - स्वजन - गुरुजन - मित्र इनका वध करने से मिलनेवाला राज्य उन्हें नहीं चाहिए।
क्या प्रभु को इसका स्मरण नहीं है?

वास्तव में अर्जुन की व्याकुलता का स्मरण होने के कारण ही प्रभु उसे ऐसा उपदेश कर रहें है। भावनाओं के ज्वार में बहनेवाले व्यक्ति को उसकी भावनाओं के मार्ग से ही सन्मार्ग पर लाया जा सकता है। इसलिए इस श्लोक में प्रभु अर्जुन की सुप्त भावनाओं को हल्के से जगा रहें है।
विश्व का सबसे प्राचीन समुपदेशक उपचार करने के उपाय हमारे समक्ष प्रस्तुत कर रहा है!

भावनिक आंदोलनों से जूझनेवाले निकट संबंधी हम सबके जीवन में होते है। हम भी तो अनेक भावनिक आंदोलनों के मध्य झूलकर असंमजस (state of confusion due to emotional distress) में पडतें है। ऐसे समय हमारी सोच की दिशा कैसी होनी चाहिए इसका यह प्रात्यक्षिक है (real life example)।

सामान्यतः हम सोचते है कि राजा / राज्यकर्ता बनना एक लाभ / विशेषाधिकार (privilege) है।
परंतु वास्तव में यह अधिकार नहीं है, कर्तव्य है !
मानव की उत्क्रांती के पडावों में जब नागर जीवन (civil life) का प्रारंभ हुआ तब, अर्थात सतयुग में सभी ओर न्याय - धर्म (कर्तव्यपालन) - विनम्रता की स्थिति थी। इसलिए समाज को किसी विशेषाधिकारी शासक की आवश्यकता नहीं थी। लोककल्याण कार्य के लिए सारे निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते थे। 
मानव समाज उक्रांती के पडाव पार करने लगा तब विकास की गति बढने लगी, संसाधन (resources) बढ़ने लगे, संपत्ती का निर्माण होने लगा और मनुष्यों के मन में कलि के प्रवेश का प्रारंभ हो गया। शनैः शनैः स्वार्थ - अन्याय - दमन - अत्याचार होने लगा जिससे अराजक (Condition similar to threat for law and order situation) की स्थिति बनने का भय निर्माण हुआ। 
ऐसी स्थिति में न्यायदान के लिए, निष्पक्ष (impartial) निर्णय लेने के लिए और समाज को सुव्यवस्थित व एकसंध (orderly & aligned) रखने के लिए अधिकारक्षेत्र की आवश्यकता निर्माण हुई। यहीं राजव्यवस्था का आरंभ है।

समाज के विचारी, प्रगल्भ और संतुलित लोगों ने राजा का चयन किया। साधारणतः यह व्यवस्था जन्माधारित परंपरा होती थी। विचार यह था की उस  विशिष्ट कुल के व्यक्ति अपने अनुभव से अर्जित ज्ञान अगली पिढीयों को अंतरित करेंगे। इससे लोककल्याण के लिए प्रेरित और उत्सुक अनुभवी राजकुल की निरंतरता बनी रहेगी (continuity of lineage which is experienced, motivated & eager for welfare of the state & its people)l 
यह भी सोचा गया कि राजकुल की  विशिष्ट परंपराएँ भी अगली पिढी में प्रवाहित होती रहेगी जिससे राजकुल का अस्तित्व व व्यवहार भी गरिमामय (graceful) बना रहेगा। इस प्रकार एक ही कुल में राज पद बना रहने से पिढी दर पिढी ज्ञान की व्याप्ती बढती है, परंपरागत अनुभव के कारण शत्रु के आक्रमणों से राज्य की सुरक्षाव्यवस्था की समीक्षा (review) कर उसमें आवश्यक बदलाव व सुधार करने के लिए राजकुल सक्षम हो सकता है।

इतने महत्वपूर्ण दायित्वों को संभालने के लिए राजा को सामान्य नागरिकों से अधिक सुविधाएँ और भोग्य सामग्री मिलना उचित माना गया। उनके निवास के लिए विशाल प्रासाद, रेशमी वस्त्र, बहुमूल्य अलंकार, दास दासियों की सेवाएँ, सुविधायुक्त क्रीडास्थान (आज की भाषा में second home / Farm house /resorts), जलदगती आरामदायी रथ इसी का भाग है। यह आजकल कंपनीयों के CEO को मिलनेवाले package समान है। भरपूर वेतन व भत्ते , अनुलब्धियाँ, गृहकार्य के लिए कर्मचारी, चालक के साथ कार, कुटुंब के साथ वार्षिक सहल के लिए यात्रा भत्ता आदि (Handsome salary & allowances, perquisites, salary for maids & other household help staff, chauffeur driven car, allowance for vacation with family etc.).
परंतु इतने सारे लाभों के साथ दायित्व भी उतना ही अधिक होता है!

हमारे इतिहास में इस दायित्व को राजधर्म कहा गया है। 
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अध्याय २ःश्लोक ३७:भाग २ : क्रमशः 
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