हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६७
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥३७॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
मेल्याने भोगिसी स्वर्ग जिंकिल्याने मही - तळ।
म्हणूनि अर्जुना उठ युद्धास दृढ निश्चये ॥३७॥
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अध्याय २: श्लोक ३७: भाग ३
आगे प्रभु कहते है कि 'कौन्तेय , इसलिए तुम युद्ध करने सिद्ध हो जाओ'।
प्रभु कितने चतुर है !
अत्यंत कोमलता से अर्जुन को यहाँ 'कौन्तेय (= कुन्तीपुत्र )' कहकर संबोधित कर रहें है।
वैसे समयसमय पर उन्होने अर्जुन को पार्थ, गुडाकेश, परंतप, धनंजय भी कहा है। अर्जुन के अन्य भी अनेकी नाम है, जैसे सव्यसाची, फाल्गुन, श्वेतवाहन आदि। परंतु यहाँ पर प्रभु ने अर्जुन का नाम नहीं लिया है, वह उन्हें कुन्तीपुत्र इस विशेषण (adjective) से संबोधित कर रहें है। उन्हे स्मरण दिला रहे है कि कुन्तीपुत्र होने के नाते उनका क्या कर्तव्य है।
द्यूत में हारने के कारण पाण्डवों को बारह वर्षों का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास करना था। द्रौपदी का पाण्डवों के साथ वन में जाना निश्चित था। अन्य पाण्डवपत्नीयों को उनके बच्चों के साथ उनके मायके भेजा गया था।
अब माता कुन्ती कहाँ रहेगी?
वनवास कुन्ती के लिए नया नहीं था किंतु अब वह वृद्ध हो गयी थी। इसलिए यह पर्याय उचित नहीं था। फिर कुन्ती को लेकर अज्ञातवास करने में पहचाने जाने की संभावना भी अधिक थी।
सुभद्रा ने कहा की माता को उनके साथ द्वारका में रहना चाहिए। सुभद्रा के पिता वसुदेव कुन्ती के भ्राता है, इसलिए वह कुन्ती का भी तो मायका ही था।
परंतु कुन्ती का विचार ऐसा नहीं था। कदाचित इसलिए की सुभद्रा की सास होने के नाते अब वसुदेव उनके समधी भी थे और कुन्ती समधीयों के सम्मुख सम्मान से रहना चाहती थी, उनके घर आश्रित के समान नहीं।
उन्होने हस्तिनापुर में ही विदुर के घर में रहने का निर्णय लिया। विदुर उनके देवर थे, इस नाते वह कुन्ती का ससुराल था और विवाहित स्त्री के लिए समधीयों के घर रहने से अधिक सम्मानपूर्ण ससुराल में रहना है ऐसा उनका विचार था। वैसे भी विदुर और उनकी पत्नी अपनी ज्येष्ठ भावज के प्रति आदर और प्रेम की भावना रखते थे।
अपने निर्णय के समर्थन में कुन्ती ने कहा कि विदुर के घर में वह सुरक्षित रहेंगी क्योंकि दुर्योधन जितना भी धृष्ट क्यों ना हो, किंतु वह कुन्ती को अपाय नहीं करेगा ऐसा उन्हे विश्वास था।
कुन्ती का निर्णय सुनकर पाण्डव व्याकुल हो गए थे क्योंकि तेरह वर्षों के पश्चात भी दुर्योधन उन्हे राज्य लौटाएगा ऐसी आशा तो किसी को भी नहीं थी। परिणाम एक ही होना था, युद्ध !
पाण्डवपत्नीयों को मायके भेजते समय भी यह निश्चित था की वह वहाँ रहकर अपने पुत्रों को युद्ध के लिए प्रशिक्षित करने की व्यवस्था करेंगी।
अर्थात प्रत्येक व्यक्ति यह जानता था की युद्ध निश्चित रूप से होगा। ऐसे में तेरह वर्षों के पश्चात भी हस्तिनापुर में आकर पाण्डव माता से मिल पाएंगे ऐसी संभावना नहीं थी। अर्थात, युद्ध में विजय प्राप्त करने पर ही माता कुन्ती से मिलने का सौभाग्य पाण्डवों को प्राप्त हो सकता था। अन्यथा, माता का दर्शन किए बिना ही वह युद्ध में वीरगति प्राप्त कर लेते।
इसलिए संभावना यह भी था कि माता और पुत्र एक दूसरे से अंतिम बार मिल रहें हो !
किंतु कुन्ती ने अपनेआप को संभाला। माता होने के कारण उनका मन पुत्रों के लिए व्याकुल था, उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित था अथवा उनकी - (कदाचित होनेवाली) पुनर्भेट के लिए शंकित था यह कुंती ने प्रकट नहीं किया, वह शान्त बनी रही।
अपने पुत्रों से कुन्ती ने कहा कि 'उन्हे वनवास के संपूर्ण काल में स्मरण रखना है कि उनकी माता कहाँ निवास कर रहीं है ! अर्थात पुत्रों का यह कर्तव्य होगा की उस नगरी में सम्मानपूर्वक प्रवेश कर वह अपनी माता को पुत्रों के साथ रहने का अधिकार और सुख वापस दें।
एक क्षत्राणी ने अपने पुत्रों की वीरता को ललकारा था और बताया था कि उन्हे अपने अपमान को, अन्याय को भूलना नहीं है ! तेरह वर्षों के पश्चात ही सही, उन्हे अपने शत्रु को पराजित कर अपना राज्य प्राप्त करना ही होगा ! क्योंकि अन्याय सहन करना भी अपराध है और कुन्ती ने अपने पुत्रों को कायरता नहीं सिखायी थी '।
अर्जुन को कुन्तीपुत्र कहकर प्रभु उन्हे माता के प्रति कर्तव्य की स्मरण करा रहें है। माता का अधिकार था कि वह पुत्रों को देखती, उनकी वृद्धावस्था में पुत्र उनकी सेवा करते। अर्जुन को यह भूलना नहीं चाहिए यह प्रभु उन्हे जता रहें है।
समुपदेशन किस प्रकार किया जाए इसका यह आदर्श वस्तुपाठ है।
मनुष्य जब भावनाओं के सैलाब के कारण निर्णय लेने से चुकने लगे तो उसे प्रेम से समझाना होता है, उसे उसके कर्तव्य का स्मरण दिलाना होता है !
प्रभु यही कर रहें है । उन्होने यहाँ अर्जुन की मातृभक्ति को भी आवाहन किया है अर्थात अर्जुन की भावनाओं को वह छू रहें है । जब वैसी संभावना हो तब प्रभु अर्जुन को डाँटना फटकार भी दे सकते है !
गीता कालातीत होने के यह कितने उदाहरण है जो हमें भगवद्गीता का उपदेश आचरण में लाने के लिए प्रेरित करते है!
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क्रमशः
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