हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७१

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। 
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥३९॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
सांख्य - बुद्धि अशी ज़ाण ऐक ती योग - बुद्धि तूं। 
तोडशील जिनें सारी कर्माची बंधनें जगीं ॥३९॥
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अध्याय २ : श्लोक ३९ : भाग २

प्रभु ने अर्जुन से कहा, "अब तक तुम्हे मैंने सांख्य दर्शन संबंधी उपदेश किया है (जिसमें संसार के सत्य स्वरूप का वर्णन है)। अब तुम योग के संबंध में सुनने के लिए प्रस्तुत हो जाओ। इससे तुम निष्काम कर्म करने का मूल तत्व समझ पाओगे। तुम कर्म को लिप्त करनेवाली (लपेटने / जकडने वाली) उपाधियाँ जैसे इच्छा / भावना आदि से विलग होकर धर्मपालन के लिए कर्तव्य करने की दृष्टी भी प्राप्त करोगे"।

कैसे सुंदर शब्द हैं प्रभु के !
अर्जुन ने तो उन्हे अपना गुरु - मार्गदर्शक सबकुछ मान ही लिया है। 
द्रौपदी स्वयंवर के समय श्रीकृष्ण के साथ हुई प्रथम भेंट से ही अर्जुन श्रीकृष्ण के परमभक्त बने हुए है। उनका शब्द अर्जुन के लिए जैसे वेदवाणी है। अपने विचार, कृति और प्राप्य के निर्णय के लिए भी अर्जुन श्रीकृष्ण की संमति आवश्यक मानते है।
समय के साथ अर्जुन की प्रभु श्रीकृष्ण के प्रति समझ परिपक्व होती रहीं है। अब मन में उठते भावनाओं के ज्वार से विव्हल अर्जुन प्रभु की शरण में आ गए है !
परंतु फिर भी अर्जुन कभी कभी भावनाओं के बवंडर (cyclone) में बहने लगते है जैसा अब हो रहा है।
नन्हे बालक के लिए माता उसका सर्वस्व होती है। माता का स्पर्श अथवा स्वर, माता की हल्की हल्की थपकियाँ बालक के प्रत्येक दुख का उपचार होती है। माता से लिपटकर बालक अपनी पीडा - वेदना - दुख जैसे उसमें स्थानांतरित कर स्वयं शांत हो जाता है।
फिर भी कभी कभी बालक का मन अत्याधिक विचलित हो जाए तो माता की गोद में बैठकर भी बालक रोए जाता है। माता के मधुर बोल, कोमल स्पर्श और वात्सल्य से भरा हुआ अलिंगन भी उसे शांत नहीं करता है और घर की, आसपडोस की शांति भंग हो जाए ऐसे उँचे स्वर में बालक का रूदन सबका ध्यान आकर्षित करता है !

अर्जुन की स्थिति कुछ कुछ उस नन्हे बालक के समान है।
प्रभु स्वयं संधिप्रस्ताव लेकर दुयोधन के पास गए थे..
अहंकारी दुर्योधन ने संधिप्रस्ताव ठुकराने के साथ ही प्रभु को ही बंदी बनाने का मूर्खतापूर्ण अयशस्वी प्रयत्न किया था...
निरुपाय से युद्ध का निर्णय हुआ था जिसके लिए प्रभु की अनुज्ञा ली गई थी...
स्वयं अर्जुन प्रभु से युद्ध में सहायता माँगने के लिए द्वारका गए थे...
... और अब जगत्पालक जगदीश श्रीकृष्ण सारथि के रूप में अर्जुन के रथ पर विराजमान है, उन्हे गाण्डीव धनुष्य की प्रत्यंचा चढाने को सूचित कर रहें है और माँ की गोद में चढकर रोनेवाले बालक के समान अर्जुन शस्त्र त्यागकर,  दयनीय होकर श्रीकृष्ण से कह रहें है कि 'युद्ध नहीं करूंगा'।

यद्यपि श्रीभगवान ने भौतिक संसार की नश्वरता का विस्तृत विवेचन किया है जिससे अर्जुन की परिजनों का वध और नरसंहार के लिए निषेधबुद्धी का अंत होना चाहिए था। 
किंतु कदाचित अर्जुन की बुद्धी की चेतना अभी लौटी नहीं है। प्रभु के पुनःपुन्हा कहने पर भी वह उदासीन अवस्था में शस्त्र त्यागकर रथ पर बैठे ही रहें है।
भगवान ने देखा की अर्जुन की भावनाएँ उसे अस्थिर कर रहीं है, उसे कर्तव्यच्युत भी कर रहीं है। इसलिए प्रभु ने वैसा मार्ग अपनाया जैसे घाव (wound) को धो - पोंछकर औषधि का लेप लगानेपर भी यदि घाव रिसता रहें तो शल्यक्रिया की जाती है।

उन्होने अर्जुन से कहा कि 'अब तुम्हे योग संबंधी उपदेश दूंगा जिससे तुम बहते स्वच्छ पानी में जैसे पथ्थर - सींप (shells) - जलचर स्पष्ट दिखाई देतें है वैसे ही तुम कर्म की उपाधियों देख पाओगे। उनकी निरर्थकता देखने पर तुम स्वधर्मप्रेरित प्रेरित कर्म की महत्ता समझ पाओगे'।
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 क्रमशः 
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