हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७३

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । 
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।।४१।।
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
ह्यांत निश्चय लाभूनि बुद्धी एकाग्र राहते।
निश्चयाविण बुद्धीचे फाटे ते संपतिची ना ॥४१॥
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रेत की घडी अर्थात Sand clock में दो अर्धगोल होतें है जिसमें से एक में रेत भरी जाती है। दो अर्धगोलों के बीच के संकरे मार्ग से रेत नीचेवाले अर्धगोल में गिरती है और उपरी भाग रिक्त हो जाता है।
अब घडी को उलट कर रखने से पुनः वहीं प्रक्रिया प्रारंभ होती है।
अर्थात अपने ही भार (weight) के कारण रेत अपना स्थान बदलती रहती है।
मनुष्य के मन में भी यही प्रक्रिया चलती रहती है।
स्वयं का अनुभव, सुनीसुनाई बातें, हमारी इच्छा - अपेक्षाएँ, औरों के जीवन का दृश्य रूप (हम उनके जीवन का जो भाग देख पातें है) और उसके संबंध में हमारा मत इत्यादी अनेक कारणों से हमारी भावनाएँ रेत के समान अपना स्थान बदलती रहती है। क्योंकि हमारा मन पुनःपुनः रेत की उस घडी समान अपनी सोच की दिशा बदलता रहता हैं। 
हमारी भावनाओं में ऐसा बदलाव हमारे निर्णयो  को प्रभावित करें संभावना सदैव बनी रहती है। क्योंकि सामान्य मनुष्यों के निर्णय साधारणतः भावना, इच्छा, वर्तमान का आकलन व भविष्य संबंधी अनुमान इनके आधारपर लिए जातें है।
अर्थात एक प्रकार से हम एक Seesaw पर बैठे हुए होतें है। भावनाओं के वजन से कभी एक बाजू का तो कभी दूसरी बाजू का पलडा भारी होकर निर्णय लिए जातें है।

सामान्य दैनंदिन जीवन के छोटे मोटे निर्णयों में इससे बहुत अधिक अंतर नहीं आता है। परंतु अर्जुन जैसी धर्मसंकट की स्थिति में ऐसे आधार पर लिए गए निर्णय कदाचित उचित नहीं रह पाएंगे। 
इसलिए प्रभु निष्काम कर्म करने का उपदेश दे रहें है। 
निष्काम कर्म करने की प्रेरणा 'निश्चयात्मक बुद्धी' से आती है। यद्यपि निश्चयात्मक बुद्धी के मूल में भी इच्छा ही होती है, किंतु इस इच्छा पर स्वार्थ का आवरण नहीं होता है। निश्चयात्मक बुद्धी न्याय और सत्य के तत्वों पर अर्थात धर्म के शाश्वत सिंहासन पर विराजमान होने के कारण वह इच्छा - भावना - अनुभवों की आँधी झेलकर भी अविचलित रह पाती है।
इसलिए निश्चयात्मक बुध्दी का परिणाम जो निष्काम कर्म है वह अनुकूल अथवा प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियो में योग्य निर्णय लेकर कार्य करने की प्रेरणा बनता है।

यदि ऐसी निश्चयात्मक बुद्धी ना हो तो मनुष्य का मन अपनी इच्छा - आसक्ति - भावना व अनुभवों के अनियंत्रित घोडों पर सवार हो सकता है। परिणामतः उसके निर्णय तर्कसंगत नहीं रह पाएंगे और अंततः वैयक्तिक / सामाजिक जीवन की हानि कर सकतें है।

भावनाओं का ज्वार - भाटा (High - Low tide) आता रहेगा..
अपेक्षाएँ हिमालय के शिखर छू सकती है..
आसक्ति का कृष्णविवर अंतहीन हो सकता है...
सुनीसुनाई बातों का चक्रव्यूह (maze) तोडना असंभव हो जाता है...
वर्तमान का आकलन करना और भविष्य का अनुमान लगाना कलाबाज के समान तार पर चलने जैसा हो सकता है (walking on a tight rope like an acrobat)...

इतनी अनिश्चितताओं के मध्य में उचित निर्णय लेने की क्षमता कम हो सकती है। मन स्वयं के लाभ के लिए अनुचित निर्णय भी ले सकता है और अपने निर्णयों का समर्थन करने की ठिठाई भी कर सकता है।
जैसे इस समय अर्जुन कर रहें है !

न्याय की पुनर्स्थापना व धर्म की रक्षा के लिए इस युद्ध की अपरिहार्यता को वह जानते है। फिर भी परिजनों के प्रति प्रेमभावना से आसक्त होकर वह युद्धविरत होने का मन बना चुके है और प्रभु के सम्मुख अपने निर्णय का समर्थन भी कर रहें है।

हमारे जीवन में भी दोराहे पर (crossroads) खडे होने की स्थिति आ सकती है। ऐसे में उचित मार्ग का चयन करने के लिए निश्चयात्मक (स्थिर) बुद्धी की आवश्यकता होगी।
प्रभु के लिए, कर्मयोगीयों के लिए सर्वसमय निश्चयात्मक बुध्दी का आधिपत्य सहजभाव हो सकता है क्योंकि निष्कार्म कर्म यह उनका सहजभाव होता है।
परंतु हम सामान्य मनुष्यों के लिए कर्मयोग को समझना निश्चयात्मक बुद्धी प्राप्त करने का मार्ग है और निश्चयात्मक बुद्धी को प्राप्त करना निष्काम करने का साधन भी है !
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 क्रमशः 
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