हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७२
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४०॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
न बुडे येथ आरंभ न घडे विपरित ही।
ज़ोडा स्वल्प ही हा धर्म तारी मोठ्या भयांतुनी
॥४०॥
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नन्हा बालक डगमगाते हुए खड़ा होता है, गिरते - पडते हुए भी चलने का प्रयास करता है। सामने कदाचित कोई खिलौना हो जो उसे चाहिए होता है। अथवा माता-पिता, दादा-दादी जो उसे हाथ पसारकर बुलातें हैं और बालक उनकी गोद में चढने को आतुर होता है।
विद्यार्थी पाठशाला में अध्ययन करते है। वह अपनी कक्षा में अच्छा स्थान (rank) पाना चाहतें हैं। भविष्य में अपनी पदवी के कारण अच्छी नौकरी - व्यवसाय करने का सपना देखतें रहतें है।
अनेक लोग व्यायाम करतें है जिससे तन - मन दोनो स्वस्थ रहें।
कुटुंबिय अपने आत्मीय जनों की, जैसे वृद्ध / विकलांग व्यक्ति इनकी सेवा करते है क्योंकि हम जिससे प्रेम करतें है उसका जीवन आनंदपूर्ण बनाना चाहतें है।
पशु पक्षी दाना चुगते है, शिकार करतें है जिससे उनकी और बच्चों की भूख शांत हो सके।
कुत्ते भौंकते है, हिरन - बंदर विशिष्ट आवाज से संकेत देते है क्योंकि उन्हे शत्रु का आभास होता है।
अनेक पशु - पक्षी समूह में रहतें है जो सुरक्षितता, अन्नप्राप्ती व वंशवृद्धी के लिए आवश्यक होती है।
मगरमच्छ धूप सेंकते है जिससे उनके शरीर का कम हुआ तापमान बढ़ता है।
कछुओं सांस लेने के लिए पानी के पृष्ठभाग पर आता रहता है।
लता ( creeper) - पौधे - वृक्ष सूरज की दिशा में बढ़तें है क्योंकि सूर्यप्रकाश से प्राप्त उर्जा पौधों के बढ़ने के लिए आवश्यक रासायानिक प्रक्रिया के लिए आवश्यक होती है।
तात्पर्य, जीवसृष्टी के प्रत्येक घटक के कर्म के मूल में कोई ना कोई प्रेरणा होती है। प्रेरणा का मूल है इच्छा, आसक्ति, भय आदि। अर्थात सुख पाने की इच्छा और दुख को दूर रखने की मनिषा का दृश्य स्वरूप है प्रेरणा।
कुछ पाने का आनंद और कुछ भी ना खोने की तीव्र भावना प्रेरणा में परिवर्तित होती है।
परंतु प्रभु तो कह रहें है कि कर्म को लिप्त करनेवाली उपाधियों को त्यागना श्रेयस्कर (beneficial) है।
परंतु यदि उपाधि (कारण) ही ना हो तो कोई भी व्यक्ति कर्म क्यों करेगा ?
प्रभु ने अभी अभी अर्जुन से कहा है कि निष्काम कर्म करने का मूलतत्व उन्हे समझना होगा।
निष्काम कर्म का अर्थ यह माना जा सकता है कि स्वार्थप्रेरित उपाधि (कारण) का त्याग करना और उस कर्म की महत्ता ( importance) के लिए कर्म करते रहना।
चोर चोरी करता है..
खाटिक पशुओं को मारतें है..
भ्रष्टाचारी असत्य का साथ देतें है..
दुष्ट व्यक्ति विकलांग / वृद्ध / असहाय्य लोगों को पीडा देतें है..
इन सब कार्यों के मूल में भी प्रेरणा ही होती है। दूसरों की पीडा से सुख पाने की विकृत प्रेरणा !
इसलिए ऐसे कार्य और उनकी उपाधि निंदनीय, त्याज्य व पारिपत्य करने योग्य है ही, किंतु प्रभु यहाँ बता रहें है कि उपर उल्लिखित अच्छे कार्यों की उपाधि का भी त्याग ही करना चाहिए !
अच्छे कर्मो में भी कहीं ना कहीं स्वयं के मन को सुखी करने की इच्छा होती है। और जहाँ स्वार्थ का छोटासा छींटा भी आ जाएगा वहाँ भविष्य में दाग पडने की संभावना भी होगी।
इसलिए श्री भगवान अर्जुन से कह रहें है कि सांख्य दर्शन के पश्चात अब कर्मयोग संबधी ज्ञान प्राप्त करने के लिए सिद्ध हो जाओ। क्योंकि कर्मयोग ही कर्म करने की विविध प्रेरणाओं के सोने के पिंजडे से मुक्ति दिला सकता है और सहज उल्लास से धर्मसंगत - न्यायसंगत - तर्कसंगत प्रेरणाओं का सृजन करता है। इस कारण मनुष्य उस कर्म को करने की बाध्यता से भी स्वतंत्र हो सकता है फिर भी कर्म करने की प्रक्रिया में और कर्म की पूर्णता होने पर भी आनंद का अनुभव कर सकता है !
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क्रमशः
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