हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६६
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
------------------------------------------------------------
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥३७॥
---------------------------------------------------------
गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
मेल्याने भोगिसी स्वर्ग जिंकिल्याने मही - तळ।
म्हणूनि अर्जुना उठ युद्धास दृढ निश्चये ॥३७॥
---------------------------------------------------------
अध्याय २: श्लोक ३७: भाग २
प्रभु ने अर्जुन से कहा है कि इस युद्ध में मृत्यु होने पर स्वर्ग की प्राप्ती होगी।
परंतु युद्ध में वीरगति पानेवाला प्रत्येक व्यक्ति स्वर्गप्राप्ती नहीं करता है।
स्वार्थ के लिए अथवा धनप्राप्ती की लालच में युद्ध करने वाला व्यक्ति, अधर्म का साथ देनेवाला व्यक्ति युद्ध में मृत्यु को प्राप्त होने पर भी स्वर्ग प्राप्त नहीं करेगा।
क्योंकि कृति से भी अधिक महत्वपूर्ण होता है उसके मूल में स्थापित उद्देश (More than actions, it is the objective that matters)।
परंतु इस युद्ध में अर्जुन का कोई स्वार्थ नहीं है। वह तो स्वयं राजा भी नहीं बनेंगे। ज्येष्ठ पाण्डव होने के नाते युधिष्ठिर राजा बनेंगे और बाकी चारो भ्राता उनके अधीन रहकर प्रजा की सेवा व राज्यरक्षण का दायित्व निभाएंगे।
इन्द्रप्रस्थ में पाण्डवों के राज्य में यही व्यवस्था थी।
राजकुल में जन्म लेने पर जितनी सुखसुविधाएँ और उपभोग्य सामग्री मिलती है उतनी जुटाना अर्जुन के लिए सहजसाध्य था। उनके अपने जीवन को सुखपूर्वक बिताने के लिए वह पर्याप्त भी होता। परंतु स्वयं के सुख को ही अपना कोश बनानेवाले व्यक्ति नहीं है अर्जुन ! वह राजकुल में जन्म के कारण स्वयं को धर्म - न्याय - नीति - प्रजाकल्याण - राज्यसुरक्षा के लिए उत्तरदायी मानते है , उनमें सत्ता की आकांक्षा नहीं है यह भी सिद्ध हुआ है।
उदाहरणार्थ, अर्जुन को मणिपुर के राज्य की राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया था (महाभारत काल का मणिपुर वर्तमान दक्षिणी ओडिशा में सागरकिनारे स्थित था)।
चित्रांगदा अपने पिता राजा चित्रवाहन की इकलौती संतान थी। राजा वृद्ध हो रहें थे। अतः उन्होने अर्जुन को राजा बनने का अनुरोध किया था।
अर्जुन ने विनम्रतापूर्वक कहा कि उनका धर्म इंद्रप्रस्थ लौटकर अपनी माता - भ्राता व कुटुंब के साथ रहना और धर्मराज युधिष्ठिर के अधीन रहकर इंद्रप्रस्थ की सेवा करना यही है, इसलिए वह राजपद स्वीकार नहीं कर सकते है।
तब राजा चित्रवाहन ने अर्जुन से उनका और चित्रांगदा का प्रथम पुत्र मणिपुर राज्य को देने का अनुरोध किया था। अर्जुन पुत्र बभ्रुवाहन भविष्य में मणिपुर के राजा बने थे । उन्होने महाभारत के युद्ध में पराक्रम किया था।
इंद्रप्रस्थ में वास्तव्य के काल में भी अर्जुन बारह वर्षों के वनवास के लिए गए थे। इस संबध में हमने देखा था कि युधिष्ठिर और द्रौपदी दोनो ही उन्हे उनके एकांतभंग के दोषी नहीं मान रहे थे। फिर भी अर्जुन ने स्वयं को तत्वतः नियमभंग का अपराधी मानकर एक तप का वनवास किया था।
राजकुल के सुखों के लिए लालायित (thirsty / solicitous) व्यक्ति इस प्रकार त्याग नहीं करता है!
तात्पर्य, अर्जुन में सत्ताकांक्षा भी नहीं थी और राजकुल के सुख पाने की आसक्ति भी नहीं थी, बल्कि उनके लिए राजधर्म के अनुसार प्रजा व राज्य की सेवा करना सर्वोपरी था।
इसलिए प्रभु उन्हे स्मरण दिला रहें है कि इस युद्ध में विजयी होनेपर उन्हे राजधर्म का पालन करने का अवसर प्राप्त होगा।
स्वसुख को पीछे रखकर कर्तव्यपूर्ति को ही जीवन का धेय्य माननेवाले अर्जुन के लिए यह मुद्दा अवश्य महत्वपूर्ण था !
-----------------------------------------------------------
अध्याय २ : श्लोक ३७ : भाग ३ : क्रमशः
-----------------------------------------------------------
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें