हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७४

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। 
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ।।४२।।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । 
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥४३॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । 
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥४४॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
अविवेकी वृथा वाणी बोलती फुलवूनियां।
वेदाचे घालिती वाद म्हणती दुसरे नसें ॥४२॥
जन्मूनियां करा कर्मे मिळवा भोग - वैभव।
भोगा कर्म फळें गोड सांगती स्वर्ग - कामुक॥४३॥
त्यामुळे भुलली बुद्धी गुंतली भोग वैभवी।
ती निश्चय न लाभूनि समाधीत नव्हें स्थिर ॥४४॥
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सनातन हिंदु धर्मपरंपरा को वैदिक परंपरा भी कहा जाता है।
वेद अपौरुषेय है अर्थात वेदों की रचना मनुष्यों ने नहीं की है वरन् समाधी की अवस्था में ऋषियों के मुख से देववाणी प्रस्फुरित हुई थी जो वेद कहलाते है।
वेद ज्ञान देतें है, उपासना की पद्धति विशद् करते है और धार्मिक कर्मकांड का विधान बताते है।
ज्ञान, उपासना और कर्मकांड इनमें तुलनात्मक दृष्टी से कर्मकांड सहजसाध्य है।

धार्मिक कृत्य ज्ञानप्राप्ती की पहली सीढी है जैसे बालवर्ग (नर्सरी) होता है। क्योंकि इससे ज्ञान प्राप्त करने की दिशा और मार्ग निश्चित होता है। 
किंतु ज्ञान की प्राप्ती पर्वत का शिखर पादांक्रात करने समान है। प्रत्येक व्यक्ति की उतनी क्षमता ना हो यह भी संभव है। इसलिए मनुष्य अपनी क्षमता के अनुसार धार्मिक कृत्य, उपासना भी कर सकता है। परंतु व्यक्ति की क्षमता जितने प्राथमिक स्तर होगी उतना पुरस्कार का मोह अधिक होता है। और उसकी क्षमता, प्रयत्न और साध्य जितनी उच्च कोटी के होंगे उतना ही पुरस्कार का मोह छूटते जाता है। इसलिए ज्ञान प्राप्ती के लिए किसी पारितोषिक की घोषणा नहीं की जाती है। ज्ञान प्राप्त करना साधन भी है और साध्य भी !

सामान्य रूप में किसी भी व्यक्ति को ईश्वर के सान्निद्ध्य का अनुभव करने के लिए, उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए धार्मिक कर्मकांड सर्वमान्य है, परंतु इसके लिए भी मनुष्य को प्रेरित करना पडता है। थोडे समय के लिए क्यों ना हो, किंतु जीवन के विविध भोगों से दूर होकर ईश्वर की पूजा प्रार्थना करने की फलप्राप्ती मृत्यु के पश्चात स्वर्ग प्राप्त करना है यह बताकर सामान्य मनुष्य को ईश्वरोन्मुख करना पडता है।

सत्कार्य यदि पुण्यप्राप्ती की इच्छा से किया जाए तब भी अच्छाई की कसौटी पर खरा उतरता है यह सत्य है किंतु इस प्रकार इच्छा के अधीन कार्य करनेवाला मनुष्य अंततः उस इच्छा का बंधक बन जाता है। जैसे स्वर्गप्राप्ती की इच्छा कर धार्मिक कर्मकांड करनेवाले व्यक्ति स्वर्गप्राप्ती को सर्वोच्च साध्य मानते है। विशिष्ट कर्म करना चाहिए अथवा नहीं यह निश्चित करने के लिए उनकी कसौटी एक ही होती है, 'इससे स्वर्गप्राप्ती होगी अथवा नहीं' यह सोचना।
यद्यपि स्वर्ग प्राप्त करने की इच्छा सात्विक इच्छाओं की श्रेणी में आती है, फिर भी वह निष्काम कर्म नहीं है। स्वर्गप्राप्ती की इच्छा से सत्कार्य करनेवाले व्यक्ति केवल स्वयं के लिए स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करनेवाले कर्म ही करते हैं।
तात्पर्य स्वयं पुण्य कमाना, स्वयं स्वर्ग में जाना यह जिसकी अंतिम आकांक्षा हो वह अन्य लोगों को भी उसी के लिए प्रेरित करता है, जीवनभर सत्कार्य करना होगा क्योंकि इसी से स्वर्ग प्राप्त होगा ऐसा कहता है, सत्कर्म से जीवन में विविध भोग प्राप्त करता और मृत्यु के पश्चात स्वर्गारोहण करना इसी को सर्वस्व मानता है।

मनुष्य का मन जब एक ही साध्य के लिए इस प्रकार अत्याधिक आसक्त होता है तब धीरे धीरे उसका मन कर्म के मूल तत्व से हट जाता है। कर्म का मूल तत्व यह है कि साध्य के न्यायसंगत होने के कारण विशिष्ट कर्म की अपरिहार्यता, फिर उसमें कर्ता की इच्छा हो या अनिच्छा, सुविधा हो या असुविधा !
परंतु स्वर्गप्राप्ती के परमआकांक्षी व्यक्ति कर्म की आवश्यकता को अलग ही कसौटी पर तौलते है जिसमे अन्य व्यक्ति / समाज / देश का हित, धर्म और न्याय की रक्षा व पुनर्स्थापना जैसे विचार निहित नहीं होतें है।

प्रभु यद्यपि उनकी निंदा नहीं कर रहें है किंतु सावधान फिर भी कर ही रहें है कि स्वयं की सात्विक ही सही किंतु इच्छा का दास बनाकर कर्म करनेवाले व्यक्ति की बुद्धी एक प्रकार से कलंकित हैं क्योंकि वह भौतिक और पारमार्थिक सुख की प्राप्ती के लिए आसक्त है। ऐसे लोग निष्काम कर्म की महत्ता नहीं समझ पातें है और उनकी बुद्धी असंतुलित होने का भय भी होता है।
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 क्रमशः
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