हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २६८
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
----------------------------------------------------------
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥३८॥
---------------------------------------------------------
गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
हानि लाभ सुखे दुःखे हार जीत करी सम।
मग युद्धांस हो सज्ज न लागें पाप ते तुज ॥३८॥
----------------------------------------------------------
अध्याय : २ - श्लोक ३८ : भाग १
हम सामान्य मनुष्यों की प्रत्येक कृति के मूल में भावना और अपेक्षाएँ होती है।
हम कृति करने से पूर्व यह विचार करतें है कि इससे हमें क्या लाभ होगा, यह हम किसलिए कर रहें है (अर्थात उससे हमें लाभ होगा अथवा नहीं), यदि किसी व्यक्ति के लिए हम कुछ करेंगे तो पहले यह सोचतें है कि वह व्यक्ति हमारे प्रिय है अथवा नहीं, उनका व्यवहार हमारे साथ कैसा होता है, वह हमारे लिए क्या क्या करतें है, भविष्य में उनसे हमें क्या काम हो सकता है आदि।
सामान्य मनुष्यों की प्रत्येक कृति ना सही किंतु अधिकांश कर्म इन मापदंडों पर तौलकर किया जाता है।
साधु - संन्यासी और स्थितप्रज्ञ मनुष्यों की सोच और उनके कर्म की प्रेरणाएँ इससे भिन्न होती है। वह हानि-लाभ, सुख-दुख, हार-जीत यह विचार नहीं करतें है। उनकी सोच स्वधर्म के दृढ (strong) धरातल पर स्थित होने के कारण वह 'न्यायोचित कर्म' इस एक मापदण्ड पर ही संभावनाओं को तौलते है (weighing options on the basis of justice)।
प्रभु अर्जुन को उपदेश कर रहें है कि उसे इस युद्ध से होनवाला लाभ-हानि, सुख-दुख, जय-पराजय इसका विचार नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह सब तो उपरी आवरण है। परंतु उसे युद्ध करना आवश्यक है क्योंकि पाण्डवों के युद्ध करने के मूल में न्याय और सत्य के शक्तिशाली तत्व है।
इसलिए प्रभु अर्जुन को समझा रहें है कि राज्य की प्राप्ती, उससे मिलनेवाले भौतिक सुख, युद्ध में विजय प्राप्त करने पर मिलनेवाली किर्ती व समाज द्वारा जयजयकार इन सकारात्मक बातों के साथ ही युद्ध में होनेवाली जीवितहानी, संबंधियों से युद्ध करने के बाध्यता की वेदना, प्रियजनों की मृत्यु इन सबकी तात्कालिकता समझकर अर्जुन को स्थितप्रज्ञता आत्मसात करनी चाहिए।
प्रभु के कहने का तात्पर्य यहीं है कि अर्जुन इस युद्ध को मानवी जीवन के मर्यादित दृष्टीकोण से ना देखें और उसे समाज में न्याय - नीति - धर्म की पुनर्स्थापना का अपरिहार्य (inevitable) मार्ग के रूप में स्वीकार करें। इससे अर्जुन युद्ध को उनके अपने वैयक्तिक जीवन के लाभ-हानि, सुख-दुख, जय-पराजय से पृथक होकर देख पाएंगे (to view war as inevitable means to restore justice and Dharma thus alienating it from personal gain or loss or fear of committing sin)।
और इस प्रकार जब अर्जुन अपना दृष्टीकोण व्यापक कर लेंगे (expanding canvas to have better perspective for understanding rational behind the war) तब वह समझ पाएंगे की यह युद्ध पाण्डवो के लिए पाप का कारण नहीं है !
गीता के श्लोकों का शब्दार्थ समझना भी अपने आप में एक उपलब्धी ही है किंतु वर्तमान काल में भी गीता की प्रासंगिकता (relevance), हम सामान्य मनुष्यों के जीवन में गीता के उपदेश की उपयुक्तता व अनुकरण की संभावना इसपर विचार किया जा सकता है !
-------------------------------------------------------------
अध्याय : २ - श्लोक ३८ : भाग २ : क्रमशः
----------------------------------------------------------
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें