हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७०

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। 
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥३९॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
सांख्य - बुद्धि अशी ज़ाण ऐक ती योग - बुद्धि तूं। 
तोडशील जिनें सारी कर्माची बंधनें ज़गीं ॥३९॥
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अध्याय २ : श्लोक ३९ : भाग १

'सांख्य' का तात्पर्य स्थूल रूप में (broad definition) 'किसी विषय का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करना है (= विषय को समझकर,उससे संबधित मुद्दों की समीक्षा कर निर्णय लेने की क्षमता आत्मसात करना)।
सांख्य दर्शन छः भारतीय दर्शनशास्त्रों में से एक महत्वपूर्ण शास्त्र है। इसमें विश्व (ब्रह्माण्ड) के मूलतत्वों का विवेचन है जैसे पंचमहाभूत, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेंद्रीय, पाँच शरीरानुभव जैसे श्रवण, गंध, दृष्टी, रसना, स्पर्श साथ ही पुरुष , प्रकृति आदि ।

अब तक श्रीभगवान ने अर्जुन को सांख्य दर्शन के एक भाग (आत्मा) संबंधी उपदेश किया है।
अर्जुन युद्ध करना नहीं चाह रहें है । उनके विचार में परिजन और संबधियों का संहार कर मिलनेवाला राज्य प्राप्त करने से अधिक राज्य का त्याग करना श्रेष्ठ है।
अर्जुन नरसंहार और जिवितहानी टालना चाहते है और स्वयं तो उसका कारण बनना ही नहीं चाहते है। श्रीभगवान समझ गए थे कि अर्जुन दृश्य संसार को (Visible, physical world) को ही सत्य मान रहें है, भौतिक अस्तित्व को ही आदि और अंत के रूप में देख रहें है, अर्जुन के मन की यह भ्रांतियाँ उन्हे उनके कर्तव्य से दूर ले जा रहीं है, इस कारण वह स्वधर्म त्यागकर पाप को प्राप्त करेंगे। 
इसलिए उन्होने अर्जुन को आत्मा के स्वरूप का ज्ञान दिया , जन्मजन्मांतर तक निरंतर चलनेवाली आत्मा की यात्रा संबंधी विवेचन किया जिससे अर्जुन के मन और बुध्दीपर पडा हुआ माया मोह का आवरण हट जाए और उन में स्वधर्म का पालन करने की इच्छा जागृत हो सके।

परंतु प्रभु की दृष्टि केवल अर्जुन का पुण्य अथवा पाप देखने जितनी संकुचित नहीं है। सर्वसामान्य मनुष्य के मन में भी यही कल्पनाएँ होती है। प्रभु इन कल्पनाओं की भ्रामकता उद्घाटित कर सामान्य जन को यह ज्ञान सरल भाषा में और सहजता से देना चाहते थे। इसलिए उन्होने गीता के माध्यम से दिया हुआ ज्ञान और किया हुआ उपदेश और अधिक वंदनीय, विचारणीय व अनुकरणीय हो जाता है (respectable, thoughtful & bound to be followed)।

इसके पूर्व हिंदु धर्मग्रंथो में, तत्वज्ञान में इसके संबंध में विवरण अवश्य किया गया होगा। इन ग्रंथों के रचयिता ज्ञानसंपन्न , विरागी ऋषि थे। अतः उन्होने निःपक्षता (impartial) दृष्टीकोण से इस विषय की प्रस्तुति की होगी यह निश्चित है।

परंतु यह ज्ञान हम सामान्य मनुष्यों की पँहुच से दूर है। प्रत्येक मनुष्य ऋषियों समान ज्ञानी नहीं हो सकता है। इसलिए श्री भगवान ने सामान्य मनुष्य के लिए सहज प्राप्त हो सके, पठन किया जा सके, जिसका अभ्यास संभव हो, जिसका निरूपण व विवेचन तुलनात्मक रूप से सहजता से किया जा सके ऐसा उपदेश गीता के माध्यम से किया है। क्योंकि कुरुक्षेत्रपर हुआ युद्ध अंतिम युद्ध नहीं है और भविष्य में ऐसे अनेक युद्ध हो सकते है यह श्रीभगवान जानते थे। ऐसे समय सामान्य मनुष्य, समाज के नेता और राज्यकर्ताओं की सोच, व्यवहार व निर्णय कैसे होने चाहिए इसके सूत्र श्रीमद् भगवद् गीता में विराजमान है ।
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 अध्याय २ : श्लोक ३९ : भाग २ : क्रमशः
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