हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७५
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
तिन्हीं गुण वदे वेद त्यात राहे अलिप्त तूं।
सत्व सांडू नको सोशी द्वंद्वे निश्चिंत सावध ॥४५॥
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भावार्थ :
प्रभु अर्जुन से कह रहें हैं कि 'वेदों में धार्मिक कर्मकांड, उपासना व ज्ञान इन तीनों की जानकारी दी गई है, विधान बताया गया है और विवेचन किया गया हैं। परंतु तुम्हे इन तीनों में किसी से भी अभिभूत हुए बिना (without getting impressed/ influenced) अपने विचारों की दिशा स्थिर रखनी चाहिए। क्योंकि इनमें से किसी एक की ओर झुकाव होना तुम्हारे दायित्व बोध को संकरा बना सकता है (Getting influenced by any of these three elements may result in narrowing understanding of your duties and responsibilities)। अथवा इन तीनों में श्रेष्ठ क्या है यह सोचोगे तो कदाचित अपने सत्व पर कायम रहने के दायित्व से दूर भी जा सकते हो'।
क्या है अर्थ प्रभु के कथन का ?
ज्ञान, उपासना व कर्मकांड तीनों में ही सात्विकता के तत्व होते हैं। किंतु इनमें से किसी एक के प्रति आकर्षण अथवा अत्याधिक आस्था के कारण अन्य दोनों के प्रति अनास्था/ उपेक्षा / तुच्छता का भाव निर्माण हो सकता है...
अपनी रुचि / प्रवृत्ति के अनुसार इन तीनों में से किसी एक में विशेष प्रवीणता प्राप्त करना अहंकार प्रस्फुरित कर सकता है...
किसी एक के प्रति अत्याधिक लगाव भविष्य में आसक्ति का रूप ले सकता है। इस कारण मनुष्य द्वारा उसके मूलभूत तत्वों को दुर्लक्षित कर आडंबर में प्रवृत्त होने की संभावना बढ़ती है (increased possibility of getting engrossed in pomposity rather than adhearing to the underlying principle of the element)।
प्रभु अर्जुन को सावधान कर रहें है कि 'ज्ञान, उपासना व कर्मकांड इन तीनों का साधन वेदों में बताया गया है । साथ ही उनके फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले भोगों का वर्णन भी किया गया है। किंतु इनमें से किसे - कैसे - कितनी प्राथमिकता देनी चाहिए ऐसा द्वंद्व मन में प्रारंभ होते ही तुम्हारा मन दिशाहीन बन सकता है। इसलिए तुम ऐसे द्वंद्व से दूर रहों, अपने स्वत्व को बनाए रखो, अपने योग - क्षेम की चिंता त्याग दो और अपने अंतःकरण की शुद्धता अक्षुण्ण (unbreakable/ intact ) रखो। इस प्रकार अपनी विचारसरणी और कर्म के हेतु पर से कोहरा (fog) हटनेपर तुम्हारी चेतना लौटेगी और तुम अपने कर्म के प्रति निष्ठावान बने रहोगे किंतु उसके दास नहीं बनोगे!'
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क्रमशः
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