हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७६
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
---------------------------------------------------------
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ।।४६।।
--------------------------------------------------------
गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
सर्वत्र भरलें पाणी तेव्हा आडांत अर्थ जो ।
विज्ञानी ब्रह्म - वेत्त्यांस सर्व वेदांत अर्थ तो ॥४६॥
----------------------------------------------------------
भावार्थ :
इस समय अर्जुन का मन त्याग और विरक्ति की ओर झुका हुआ है । इसलिए वह युद्ध ना करने पर तुले हुए है।
युद्ध ना करने की इच्छा के समर्थन के लिए वह ज्ञान की बातें कर रहें है, परस्परसंबंधों के महत्व को अधोरेखित कर रहें है। नातेसंबंधों का महत्व बतातें हुए परिजनों की मृत्यु व व्यापक नरसंहार का कारण बनने को अयोग्य बता रहें है।
अर्जुन के लिए यह धर्मसंकट है । एक ओर प्रिय संबंधी, गुरुजन, मित्र आदि के लिए आदर और प्रेम की भावना रखने का, उनकी रक्षा करने का कर्तव्य है और दूसरी ओर व्यापक धर्मरक्षा का दायित्व है। संकट तो है किंतु ऐसे में निर्णय कैसे लेने चाहिए यह प्रभु उन्हे जिस प्रकार समझा रहें है वह बोध हम सामान्य मनुष्यों के दैनंदिन जीवन के लिए भी है !
हम भी 'अपनों' से प्रेम करतें है परंतु परिस्थितियाँ कभी कभी हमें उन्ही के विरुद्ध खडा कर देती है ..
हम सद्भावनापूर्वक जीना चाहतें है, विनम्र व्यवहार और मृदु भाषण करना चाहतें है परंतु कभी कभी परिस्थितियाँ हमें कठोर भाषण करने के लिए विवश कर देती हैं...
हम शांतताप्रिय राष्ट्र बने रहना चाहतें है परंतु हमारे युद्धखोर पडोसी देश हमें सदैव युद्धसज्ज रहकर कभी कभी शक्तिप्रदर्शन और कभी तो सैनिकी कार्रवाई करने को भी बाध्य करतें है...
ऐसी स्थितियों में क्या करना चाहिए ?
दूसरों का मन संभालने के लिए अर्थात उनकी स्वार्थपूरित इच्छाएं पूर्ण करने के लिए हम पीछे हट जाएं ?
दूसरों का उद्धत व्यवहार सहन कर हम उन्हे और आक्रमक इसलिए बनने दें कि हम शालीन व्यवहार और मृदु भाषण में आस्था रखतें है ?
और राष्ट्र के रूप में हम अपनी भूमि गँवा दें, हमारे शूर सैनिक और सैन्याधिकारियों का व्यर्थ बलिदान देतें रहें क्योंकि हमें अपनी 'शांतताप्रिय राष्ट्र' की प्रतिमा पर अभिमान करते रहना हैं ?
परंतु क्या यह सब काल की कसौटी पर खरा उतरेगा ?
जनमानस में स्वयं की सौम्य प्रतिमा बनाएं रखना और विश्व में शांतिप्रिय राष्ट्र का गौरव प्राप्त करना इसका मूल्य क्या है यह गंभीरता से सोचना होगा। क्योंकि इसका मूल्य यदि हमारे वैयक्तिक जीवन में स्वार्थी और लालची व्यक्तियों के लिए खुला मैदान छोडना और युद्धखोर - विवादप्रिय - लोभी पडोसी राष्ट्रों के समक्ष घुटने टेककर इस देश की भूमि, राष्ट्रीय संपत्ति गँवाकर देशभक्ति की भावना को क्रमशः टूटने देना है तो फिर मानवी जीवन किन मूल्यों पर टिका रह सकता है ?
फिर नरसंहार के प्रति विरोध का अर्थ तो क्या यह होगा कि -
राजा पोरस को अलेक्झांडर के सामने घुटने टेकनें चाहिए थे ...
सिंध के राजा दाहिर को मुहम्मद बिन कासिम का विरोध ही नहीं करना चाहिए था...
पृथ्वीराज चौहान को मुहम्मद घोरी के समक्ष शरणागति लेनी चाहिए थी...
शिवाजी महाराज को स्वराज्य स्थापना का सपना भी नहीं देखना चाहिए था ...
मराठों को दिल्ली पर धावा बोलकर मुगलों को अंकित नहीं करना चाहिए था...
अंग्रेजों के विरुद्ध स्वातंत्र्य संग्राम में ना १८५७ का युद्ध करना चाहिए था, ना क्रांतिकारकों को अंग्रेज अधिकारियों को मारना चाहिए था, ना नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आजाद हिंद सेना का गठन करना चाहिए था और ना नौसनिकों को १९४६ में उठाव करना चाहिए था...
भारत की सेना को बांगलादेश की मुक्ति के लिए १९७१ में युद्ध नहीं करना चाहिए था...
हमें १९९९ में कारगिल हमारे पडोसी देश को समर्पित करना चाहिए था...
धर्मशील और शांतताप्रिय होने का अर्थ सदैव घुटने टेककर विनम्रता से शरणागति को प्रस्तुत होता नहीं होता है यहीं समझा रहें हैं प्रभु !
श्रीराम ने ताटका - वाली और रावण का संहार किया था और श्रीकृष्ण ने कंस और शिशुपाल का वध किया था !
हम यदि श्रीराम और श्रीकृष्ण को हमारे परम आराध्य मानतें है तो रामनवमी और जन्माष्टमी पर उनका जन्मोत्सव मनाने का अर्थ है स्वयं को स्मरण दिलाना की वह अन्याय का अंत और दुष्टों का निर्दालन करने के लिए अवतरित हुए थे।
अहिंसा के तत्व अवश्य पूजनीय होने चाहिए परंतु जैसे स्वरक्षण के लिए और दूसरों के प्राणरक्षण के लिए की गई हत्या कानून भी मान्य करता है उसी प्रकार न्याय की रक्षा के लिए किए गए कठोर प्रबंध और स्वजनों का विरोध भी अत्यावश्यक अतः समर्थनीय होता है यही प्रभु के कथन का तात्पर्य है !
-----------------------------------------------------------
क्रमशः
----------------------------------------------------------
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें