हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७८

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । 
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते
॥४८॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
फळ लाभों न लाभो तू निःसंग सम होऊनि ।
योग - युक्त करीं कर्मे योग - सार समत्व चि ॥४८॥
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प्रभु ने फल की आसक्ति ना रखते हुए कर्म करने का उपदेश अर्जुन को किया है।
अब वह बता रहें है कि ऐसा करने का मार्ग कौनसा हो सकता है।
अत्यंत तर्कसंगत पद्धति से श्रीभगवान उपदेश को आचरण में बदलने के लिए मार्गदर्शन कर रहें है। क्योंकि उपदेश केवल पुस्तकों में वर्णित आदर्श बनकर रहें और सामान्य मानवी व्यवहार में उनके अनुसार आचरण संभव ना हो तो उपदेश खोखले (hollow & irrelevant) बन जाएंगे। 

उदाहरणार्थ, किसी व्यक्ति के पीछे एक क्रोधित - अनियंत्रित बैल भाग रहा हो तो हमें क्या करना चाहिए ?
बैल को को मार डालना हिंसा है जिसे यथासंभव टालना होगा। परंतु उस बैल को वैसे ही अनियंत्रित छोडना भी अनुचित है। ऐसा करना उस व्यक्ति के लिए और अन्य व्यक्तियों के लिए भी संकट होगा।
ऐसे में उपाय क्या होगा ?
वेग से सीधे दौडनेवाला बैल अचानक अपनी दिशा नहीं बदल सकता है। इसलिए पहले तो हमें चिल्लाकर उस व्यक्ति को बताना होगा की वह अचानक दायीं अथवा बांयी ओर मुडकर किसी सुरक्षित स्थान में शरण लें।  संभव है कि क्रोध में दौडता हुआ बैल किसी पेड अथवा दीवार से टकराकर थम जाए। उसे चोट आएगी किंतु प्राण रक्षा होगी। फिर उसे रस्सीयों से बांधकर, जकडकर शांत करने के उपाय किए जा सकतें है। 
अर्थात बैल को मार डालने का हिंसक कर्म अनावश्यक होगा। परंतु यह भी मानना होगा की ऐसी स्थिति में बैल को चोट आना हिंसा नहीं है। अहिंसा के तत्वों को का अतिरेक कर बैल को चोट से बचाने का अर्थ उस मनुष्य के प्राणों पर संकट भी हो सकता है।
अर्थात , स्थिति सामान्य हो अथवा संकट की हो, इनमें कोरे आदर्श नहीं, बल्कि योग्य मार्ग ढूंढना आवश्यक होता है।

उदाहरण के लिए अभिभावक अपने बच्चे का लालनपालन करतें है। बच्चे को समर्थ बनाकर अपने बलबूते पर समाज में खडा होने के लिए, आर्थिक समृद्धी प्राप्त कराने के लिए, मानसिक दृष्टी से दृढ बनाने के लिए आवश्यक परिवेश और शिक्षा उपलब्ध कराते है। इस में दायित्व बहुत अधिक है परंतु यह प्रक्रिया ही अपनेआप में आनंददायी है, छोटे से अंकुर का वृक्ष बनते देखने जैसा है।

अब यदि वही बच्चा विरक्तिपूर्ण जीवन का मार्ग चुनकर संन्यासी बन जाए, किसी संस्था से जुडकर आजीवन सेवक बन जाए अथवा अविवाहित रहकर समाजसेवा करने का निर्णय लें, तो माता - पिता के मन को धक्का लग सकता है। लौकिक - भौतिक सुख को त्यागकर स्वयं को तपाने का निर्णय उन्हे अच्छा ना लगे। कदाचित, वृद्धावस्था में बच्चे और उसके कुटुंब का सहारा मिलने की संभावना ना रहनेपर वह निराश हो जाए।

किंतु फिर भी, बच्चे को पालपोसकर बडा करने के काल का उनका आनंद तो उनसे कोई वापस नहीं मांग सकता है !
बच्चे को सर्वदृष्टी से समर्थ बनाने का दायित्व पूर्ण करने के कर्म का श्रेय तो उनके खाते में जमा ही हुआ है!
टूटेगी उनकी आशा, ढह जाएंगे उनके सपनों के प्रासाद और मिटेगी कर्म का प्रतिफल (remuneration) पाने की संभावना !

परंतु कर्म तो ज्यों का त्यों खडा ही है !!!

इसलिए मनुष्य को कर्म के लिए भविष्य में मिलनेवाले पारिश्रमिक अर्थात कर्म के फल के प्रति आसक्त नहीं होना चाहिए।

अतः प्रभु कह रहें है कि मनुष्य को कर्म करते रहना होगा परंतु उसके फल को प्राप्त करने की इच्छा को नियंत्रित रखना होगा। इच्छित फल प्राप्त होने पर आनंद की प्राप्ती स्वाभाविक है किंतु फल प्राप्त होने की निश्चिती हो तभी कर्म करना और फल की प्राप्ती अनिश्चित होने पर कर्म ना करना समर्थनीय नहीं होगा। 

कर्म अपनेआप में साधन भी है और साध्य भी है। 
यदि सबकुछ अनुकूल है तब कर्तव्य के अनुसार कर्म करना कदाचित आनंददायी हो, किंतु विपरित (adverse) परिस्थितियों में भी आदर्शों को ही अपना पथदीप  (Guiding light) मानना यही मनुष्यत्व के मार्ग से देवत्व की ओर जाने का लक्षण है !
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 क्रमशः 
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