हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७७
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥४७।।
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
कर्मातचि तुझा भाग तो फळांत नसो कधी ।
नको कर्म फळी हेतु अकर्मी वासना नकों ॥४७॥
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यह श्लोक गीता के अतिशय प्रसिद्ध श्लोकों में से है। अनेक व्यक्तियों के लिए यह जीवन का एकमात्र आधार बना हुआ है। नि:संशय (undoubtedly) कर्तव्यपालन मनुष्यजीवन के सर्वश्रेष्ठ तत्वों में से है किंतु अनेक मनुष्यों के जीवन में केवल कर्तव्य निभाने की ही स्थिति होती है, मनोरंजन अथवा विश्राम का भी अवकाश नहीं होता है। वह अपने कर्तव्यबोध के कारण कठिन दायित्व लेतें है, उनके कारण अन्य व्यक्तियों का जीवन सहज व सुखकारक होता है किंतु वही कुटुंबजन उनके प्रति उदासीन बने रहते है।
ऐसे व्यक्तियों के लिए प्रभु के यह शब्द जैसे मरुभूमि में अमृतकण समान चेतना जगाते है।
श्रीभगवान अर्जुन को बता रहें है कि मनुष्य के लिए कर्म करते रहना आवश्यक है। -कर्म करने की प्रेरणा कर्म का फल भी हो सकती है। किंतु फल में इतनी आसक्ति नहीं रखनी चाहिए जिससे मनुष्य कर्म करने का और कर्तव्य पूर्ण करने का आनंद गँवा दें। फल के प्रति अभिलाषा का अतिरेक अंततः दुख, निराशा, हताशा का कारण बन सकता है, मार्ग से भटका सकता है अथवा भविष्य में कर्तव्यच्युत कर सकता है।
उदाहरणार्थ, विद्यार्थी परिक्षा के लिए मन लगाकर तयारी करतें है। वह चाहते हैं कि परिणाम अच्छा हो। परिक्षा यदि नौकरी पाने के लिए तो नौकरी मिलने कि इच्छा भी स्वाभाविक है।
अध्ययन करना विद्यार्थी का धर्म है इसलिए वह उसके लिए नियत कर्म है। अच्छे गुण पाने की, नौकरी पाने की इच्छा - आकांक्षा भी स्वाभाविक ही है।
किंतु इच्छित फल की प्राप्ती पर किसी भी मनुष्य का वश नहीं होता है। बाकी सारे विद्यार्थी भी तो अध्ययन करतें है, उनकी भी तो इच्छाएँ होंगी l इसलिए यह मान्य करना होगा की जो श्रेष्ठ है उसी को सबसे अधिक अंक (marks) मिलेंगे, उन्ही को नौकरी मिलेगी। बाकी सब को अपने प्रयत्न करते रहने होंगे।
यदि यह मान्य ना हो तो आत्यंतिक निराशा हो सकती है, अपना मनभावन पाने के लिए उत्कोच (bribe) देने का मोह हो सकता है अथवा हताशा के कारण मन ढीला पड जानेपर विद्यार्थी आगे ना तो प्रयत्न करेंगे ना पर्याय पर विचार करेंगे।
अर्थात यह निश्चित है कि फल की आशा ही कर्म की प्रेरणा हो सकती है किंतु कर्म करने का कर्तव्यबोध भी अपनेआप में एक उपलब्धि है यह समझना होगा।
क्योंकि कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं होता। वह मनुष्य के अनुभव में वृद्धी करता है और उसकी क्षमताओं को अधिक बल देता है। कर्म करते समय अनेक पर्याय उभरकर आ सकतें है, कर्म करने की प्रक्रिया में अनेकों के साथ संबंध बनते - बढ़तें है जिससे अनेक नयी संभावनाओं की नींव पडती है।
प्रत्येक अपयश अक्षम होने का प्रमाण नहीं होता है। अनेकों बार अपयश ही संभावनाओं के द्वार खोलता है ! अपयशी व्यक्ति अधिक प्रयत्न कर यश प्राप्त कर लेगा यह भी संभव हो सकता है।
कभी कभी तात्कालिक रूप में जो अपयश प्रतीत होता है, वहीं भविष्य के यश के लिए आवश्यकता भी हो सकता है। जैसे, मछुआरे मछलियाँ पकडने के लिए पानी में जाल डालतें है। कदाचित कभी कम ही मछलियाँ मिले। इसका अर्थ यह भी तो है कि छोटे आकार की अविकसित मछलियाँ जाल में से निकल गई हो जो भविष्य में बडी मछली बनकर मछुआरों की आजिविका का साधन बनेंगी।
तात्पर्य, कर्म करते रहना यह मनुष्य का धर्म है, परम कर्तव्य है !
किंतु फल पर दृष्टी गडाकर और उसे ही कर्म का साध्य मानकर चलना हितकर नहीं होगा। अपना कर्म पूर्ण निष्ठा - लगन और प्रामाणिकता से करते समय, फल का निर्णय अनेक घटकों पर निर्भर होगा यह भावना मन में होनी चाहिए।
फिर, कर्म करना यह फल मिलने का आश्वासन नहीं है इसलिए कर्म छोडकर बैठना भी प्रकृति के नियम से विरुद्ध है। जैसे, हम बाघ को जंगल का राजा मानतें है। प्राणीजगत की अन्नश्रृंखला के शीर्ष पर बाघ होता है (apex predator/ on top of the food chain)। परंतु उसे शिकार करने के लिए कितने कष्ट करने पडतें है। कितने ही प्रयासों में छिपकर, दौडकर, झपटकर भी शिकार हाथ से निकल जाती है। अनेक प्रयत्नों के पश्चात कहीं एकाध प्राणी उसकी पकड में आता है। परंतु बाघ प्रयत्न छोडता नहीं है, चिडिया का घोंसला कोई जितनी ही बार तोड दें, वह पुनः तिनके जोडकर घोंसले का निर्माण कर ही लेती है..
इसिलिए फल / परिणाम कि आशा रखे बिना केवल कर्म में रत होने का उपदेश श्रीभगवान अर्जुन को कर रहें है।
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क्रमशः
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