हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २८०
जय श्रीराम 🚩🚩
🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥५०॥
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे)
येथे समत्व - बुद्धीने टळे सुकृत - दुष्कृत।
समत्व जोड ह्यांसाठी ते चि कर्मात कौशल ॥५०॥
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भावार्थ :
स्वर्ग - नरक के समान कल्पनाएँ अन्य धर्मों में भी है। ख्रिश्चन धर्मीय heaven - hell मानते है, मुस्लिम धर्मीय जन्नत - जहन्नुम मानतें है। अर्थात मृत्यु के पश्चात स्वर्गप्राप्ती के कारण की आकांक्षा रखना सर्वमान्य है। क्योंकि स्वर्ग का अर्थ अनंतकाल के लिए आनंद और चरमसुख की प्राप्ती माना जाता है ।
यहाँ पर सनातन हिंदु धर्म की मान्यताएँ और सीख अन्य धर्मों से पृथक हो जाती है। अन्य सब धर्मों में स्वर्गप्राप्ती मनुष्य जीवन की उपलब्धियों का परमोच्च बिंदु बताया गया है। परंतु हिंदु धर्म में यह केवल एक पडाव है। मनुष्य के सत्कर्मों के फल के रूप में स्वर्ग मिलता है और दुष्कर्मों के लिए नर्क मिलता है। परंतु वह सदा के लिए नहीं होता है। जितना कर्म है उतना ही फल रहेगा। स्वर्ग और नर्क में अपने कृत्यों के फल भोगने के पश्चात पुनः जन्म लेना होता है। जबतक मनुष्य अपनी साधना से मोक्ष प्राप्त करने योग्य नही हो जाता है , तब तक उसे पुनः जन्म लेते रहने होंगे।
श्रीमद् आदि शंकराचार्य ने अत्यंत सुंदरता से जीवन मृत्यु के इस चक्र का वर्णन कर भगवान श्रीकृष्ण से मुक्ति देने की प्रार्थना की हैं।
'मोहमुद्गर' स्तोत्र (भज गोविन्दम् स्तोत्र का दूसरा नाम) आचार्य कहतें है-
"पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥"
(भावार्थ : पुनःपुनः जन्म और मरण, पुनःपुन्हा माता के उदर में नौ महिनों तक वास करना ऐसे कष्टपूर्ण चक्र से मुक्ति देने के लिए हे मुरारी, आप कृपा दृष्टी किजिए।)
इसलिए प्रभु अर्जुन से कह रहें है कि अपने कर्म को सत्कर्म और दुष्कर्म की कसौटी पर तौलकर निर्णय लेना उपयुक्त नहीं होगा क्योंकि सत्कर्म और दुष्कर्म का विचार सहेतुक (with intention) है। पुरस्कार पाने के लिए सत्कर्म जाता है और दण्ड से बचने के लिए दुष्कर्म टाला जाता है !
तो इसमें समत्व बुद्धी कहाँ है ?
फिर, सत्कर्म और दुष्कर्म की व्याख्या भी स्थल - काल - उद्देश्य सापेक्ष है।
जैसे, प्राणहरण करना यदि पाप हैं तब भी मातृभूमि की रक्षा करते समय शत्रुपक्ष के सैनिक को मार गिराना पाप नहीं हो सकता है !
नारी का सम्मान करना यदि धर्म है परंतु अत्याचारी/ क्रूर नारी को दण्डित करना भी कर्तव्य है !
असत्य भाषण पाप है परंतु किसी की प्राणरक्षा / शीलरक्षा के लिए कहा गया असत्य भाषण समर्थनीय होगा।
अतः प्रभु उपदेश कर रहे है कि सत्कर्म / दुष्कर्म के विचार में भ्रमित होकर निर्णय लेना मनुष्य के हित में नहीं है। क्योंकि ऐसी पद्धत मकड़ी के जाल में फंसे हुए कीट के समान मनुष्य को अंतिमतः असहाय्य बना देती है।
इसके विपरीत, समत्व बुद्धी सत्य - न्याय - धर्म की रक्षा करने के तत्व पर आसीन होती है । इसलिए वह मनुष्य को कर्मफल की इच्छा से मुक्त करती है और कर्म की सार्थकता का अनुभव भी कराती है !
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क्रमशः
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