हिंदु धर्मसंस्कार 🚩 : भाग २७९

जय श्रीराम 🚩🚩

🕉️श्री परमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता : अध्याय २
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दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय । 
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥४९।।
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गीताई (मराठी अनुवाद : आचार्य विनोबा भावे) 
समत्व - बुद्धी ही थोर कर्म तीहूनी हीन चि ।
बुद्धीचा आसरा घे तूं मागतीं फळ  दीन ते ॥४९॥
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भावार्थ :
भावनाएँ जीवसृष्टी की विशेषता है। ना केवल मनुष्य, बल्कि प्राणी भी प्रेम - वात्सल्य - कृतज्ञता - क्रोध जैसी भावनाएँ रखते है। स्वर्गीय जगदीशचंद्र बोस ने सिद्ध किया था कि पौधों में भी भावनाएँ होती है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि उत्क्रांती की प्रक्रिया में शीर्षस्थ रहें मनुष्यों में भावनाएँ भी अत्यंत तीव्र होंगी। 

परंतु उत्क्रांती की प्रक्रिया में आगे रहने पर यह भी दायित्व बनता है कि मनुष्य को भावनाओं के स्तर पर निर्णय और कृति नहीं करनी चाहिए। क्योंकि इसी उत्क्रांती प्रक्रिया में मनुष्य ने 'विवेक' भी पाया है !
अतः निर्णय और कर्म के लिए भावनाओं को विवेक की नींव पर खडा करना होगा।

अर्जुन इस समय आत्मीय जनों के प्रति प्रेमभावना में बद्ध होकर कर्तव्य को अनदेखा कर रहें है।किंतु जीवसृष्टी का विकास, उत्कर्ष और भविष्य की शाश्वतता के लिए कर्तव्य को भावनाओं से आगे रखना होगा यह प्रभु समझा रहें है।
मृदु भावनाएँ स्वार्थरहित जीवसृष्टी का आधार अवश्य है, किंतु 'अति सर्वत्र वर्जयेत' यह भी ध्यान में रखना होगा।
जैसे अग्नि के कारण भोजन पकाया जा सकता है किंतु अनियंत्रित अग्नि से विध्वंस होता है।
जल (पानी) को जीवन कहा जाता है। परंतु प्लावन (बाढ) के समय यही जल कालमुख बन सकता है।

अर्थात, कोई भी तत्व कितना ही कल्याणकारी क्यों ना हो किंतु उसे भी नियंत्रण में रखना आवश्यक होगा। भावनाओं के सागर में गोते लगाकर असहाय्यता से लिए गए निर्णय मनुष्य समाज के लिए हितकारी नहीं होंगे यही बात प्रभु अर्जुन से कह रहें है।

जैसे किसान कष्टपूर्वक खेती करते है। परंतु कभी सूखा, कभी अवर्षण के कारण कृषि उपज (crop) की हानि होती है। ऐसे लगातार होने पर दुःखावेग में किसान यदि खेती छोड देने का निर्णय लें तो उसके कुटुंब की आजिविका प्रभावित होगी और अन्न ना मिलने पर समाज संकटग्रस्त हो जाएगा .. 

समाज / राष्ट्र का सुचारू संचालन व प्रगति के लिए विविध नियम और कानून बनाएं जातें है, विभिन्न नियंत्रण प्रणालियाँ गठित की जातीं है। फिर भी नियम और कानून तोडनेवालों की और गंभीर अपराध करनेवालों की संख्या लक्षणीय है। अतः निराश होकर सरकार यदि नियम और कानून हटा ही दें तो समाज में अराजक की स्थिति हो जाएगी।

किसी व्यक्ति की दुर्भाग्यपूर्ण असमय मृत्यु (untimely death) के पश्चात उसका पति / पत्नी यदि अति शोकाकुल होकर सांसारिक कर्तव्यों से मुख मोड लें तो परिवार बिखर सकता है, बच्चों का भविष्य दांव पर लग सकता है !

इसलिए प्रभु कह रहें है कि (यद्यपि सुख और दुख, हर्ष और शोक, आसक्ति और विरक्ति आदि सभी भावनाएं मानवी जीवन का अभिन्न अंग रहेगी किंतु) भावनाओं के रज्जुओं में बंधे रहते हुए भी मनुष्य को भावनाओं को ध्वस्त किए बिना उनसे उपर उठने का कौशल सीखना होगा। 
क्योंकि कर्म की प्रवृत्ति मनुष्य के मन में उठनेवाले भावनाओं के बवंडर में फसकर फिसलने की है। भावनाओं के ज्वार भाटे पर सवार होकर कर्तव्य पालन के प्रति उदासीन होने की प्रवृत्ति 'कर्म' में है। किंतु समत्व बुद्धी ध्रुव तारे के समान  प्रत्येक काल में और प्रत्येक परिस्थिति में अविचल रहती है ! बाहरी तत्वों से प्रभावित होने की प्रवृति 'समत्व बुध्दी' में नहीं होती है।
समत्व बुद्धी निष्पक्ष होती है।
वह मत्सर - इर्ष्या - द्वेष - बैर - आसक्ति आदि भावनाओं से मुक्त होती है। 
समत्व बुध्दि न्याय और सत्य में आस्था रखती है।
इसलिए तात्कालिक लाभ हो अथवा हानि, परंतु भविष्यकालीन समतोल समाज के लिए समत्व बुद्धी के तत्व को अंगिकार करना वैयक्तिक / राष्ट्रीय/ वैश्विक स्तर पर हितकारी होगा !

उदाहरण के लिए पॅरिस ओलंपिक में भालाफेंक में स्वर्णपदक पाकिस्तान के अर्शद नदीम को मिला था जिसपर पूर्व स्वर्णपदक विजेता नीरज चोप्रा ने 'नदीम महान खिलाडी है' इस आशय का वक्तव्य देकर उनका अभिनंदन किया था। यश और अपयश को समत्व बुध्दी से स्वीकारनेवाले मनुष्य के लिए ही यह संभव है !

टोक्यो ओलंपिक में शूटिंग में पदक ना मिलने पर निराश मनू भाकेर ने श्रीमद्भगवद् गीता का अभ्यास कर मन को स्थिर किया और गीता के उपदेश को आचरण में लाकर वह पुनः कर्मबद्ध हो गई। पॅरिस में दो पदक प्राप्त कर उन्होंने समत्व बुद्धी जागृत रखकर कर्म करने के फल का प्रमाण दिया !

इसिलिए प्रभु कह रहें है कि मनुष्य को केवल समत्व बुध्दी का अंगिकार करना चाहिए और कर्म करने की अपरिहार्यता को मानकर निरंतर कर्मरत होना चाहिए।
इससे फल की आसक्ति नष्ट हो जाती है और मनःशांति का लाभ होता है !
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क्रमशः
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